Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 21

97 Mantra
33/21
Devata- वेनो देवता Rishi- सुनीतिर्ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ सु॒ते सि॑ञ्चत॒ श्रिय॒ꣳ रोद॑स्योरभि॒श्रिय॑म्।र॒सा द॑धीत वृष॒भम्। तं प्र॒त्नथा॑। अ॒यं वे॒नः॥२१॥

आ। सु॒ते। सि॒ञ्च॒त॒। श्रिय॑म्। रोद॑स्योः। अ॒भि॒श्रिय॒मित्य॑भि॒ऽश्रिय॑म् ॥ र॒सा। द॒धी॒त॒। वृ॒ष॒भम् ॥२१ ॥

Mantra without Swara
आ सुते सिञ्चत श्रियँ रोदस्योरभिश्रियम् । रसा दधीत वृषभम् तम्प्रत्नथायँवेन्॥

आ। सुते। सिञ्चत। श्रियम्। रोदस्योः। अभिश्रियमित्यभिऽश्रियम्॥ रसा। दधीत। वृषभम्॥२१॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम ( रसाः) सारवान्, बलवान् एवं तीव्र वेग -से जाने वाले जलप्रवाहों के समान बलवान् होकर (रोदस्योः अभिश्रियम् ) आकाश और पृथिवी के बीच सर्वत्र शोभाजनक (वृषभम् ) वर्षणशील सूर्य या मेघ के समान राजवर्ग और प्रजावर्ग या दो बड़े राज्यों के बीच ( अभिश्रियम् ) अति अधिक शोभा पाने वाले, आश्रय करने योग्य, एवं ( वृषभस् ) अति बलवान् पुरुष को (सुते) राष्ट्र के बीच में ( श्रियम् ) राज्यलक्ष्मी (असिञ्चत) प्रदान करके अभिषेक करें और वह राज्य को (दधीत) धारण करे ।'तं प्रत्नथा ०' और 'अयं वेन: ०' ये दोनों (अ० ७/१२) और (२६) मन्त्रों की प्रतीक मात्र हैं । उनकी व्याख्या वहीं देखो ।
Subject
मेघ के समान उदार पुरुष को मुख्य पद पर स्थापन करने का उपदेश ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
सुनीतिर्ऋषिका । रसाः । गायत्री । षड्जः ।।