Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 2

97 Mantra
33/2
Devata- अग्नयो देवताः Rishi- विश्वरूप ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
हर॑यो धू॒मके॑तवो॒ वात॑जूता॒ऽउप॒ द्यवि॑।यत॑न्ते॒ वृथ॑ग॒ग्नयः॑॥२॥

हर॑यः। धू॒मके॑तव॒ इति॑ धू॒मऽके॑तवः। वात॑जूता॒ इति वात॑ऽजूताः। उप॑। द्यवि॑ ॥ यत॑न्ते। वृथ॑क्। अ॒ग्नयः॑ ॥२ ॥

Mantra without Swara
हरयो धुमकेतवो वातजूताऽउप द्यवि । यतन्ते वृथगग्नयः ॥

हरयः। धूमकेतव इति धूमऽकेतवः। वातजूता इति वातऽजूताः। उप। द्यवि॥ यतन्ते। वृथक्। अग्नयः॥२॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
जिस प्रकार ( वृथक् ) नाना प्रकार के ( अग्नय: ) अग्निएं (हरयः) पीत वर्ण के आंत तेजस्वी, (धूमकेतवः) धूम से दूर से ही जानने योग्य, ( बातजूताः) वायु द्वारा प्रदीप्त होकर (द्यवि ) प्रकाश के निमित्त ( उप यतन्ते) जला करते हैं, उसी प्रकार (अग्नयः) तेजस्वी, ज्ञानी पुरुष (हरयः) ज्ञान धारण करने हारे (धूमकेतवः) धूम के समान चतुर्दिगन्त फैलने वाले ज्ञान से युक्त और (वातजूताः) वायु के समान प्राणपद, परमेश्वर की उपासना वा प्राणायाम से वा वायु के समान बल से बलवान् होकर (द्यबि) प्रकाश और ज्ञान के निमित्त (उप यतन्ते ) यत्न करते हैं ।
Subject
प्रजापालक विद्वान् अग्नियों का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
विश्वरूप ऋषिः । अग्नयः । गायत्रा । षड्जः ॥