Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 11

97 Mantra
33/11
Devata- अग्निर्देवता Rishi- पराशर ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ यदि॒षे नृ॒पतिं॒ तेज॒ऽआन॒ट् शुचि॒ रेतो॒ निषि॑क्तं॒ द्यौर॒भीके॑।अ॒ग्निः शर्द्ध॑मनव॒द्यं युवा॑नꣳस्वा॒ध्यं जनयत्सू॒दय॑च्च॥११॥

आ। यत्। इ॒षे। नृ॒पति॒मिति॑ नृ॒ऽपति॑म्। तेजः॑। आन॑ट्। शुचि॑। रेतः॑। निषि॑क्तम्। निषि॑क्त॒मिति॒ निऽसि॑क्तम्। द्यौः। अ॒भीके॑ ॥ अ॒ग्निः। शर्द्ध॑म्। अ॒न॒व॒द्यम्। युवा॑नम्। स्वा॒ध्य᳖मिति॑। सुऽआ॒ध्य᳖म्। ज॒न॒य॒त्। सू॒दय॑त्। च॒ ॥११ ॥

Mantra without Swara
आ यदिषे नृपतिन्तेज आनट्शुचि रेतो निषिक्तन्द्यौरभीके । अग्निः शर्धमनवद्यँयुवानँ स्वाध्यञ्जनयत्सूदयच्च ॥

आ। यत्। इषे। नृपतिमिति नृऽपतिम्। तेजः। आनट्। शुचि। रेतः। निषिक्तम्। निषिक्तमिति निऽसिक्तम्। द्यौः। अभीके॥ अग्निः। शर्द्धम्। अनवद्यम्। युवानम्। स्वाध्यमिति। सुऽआध्यम्। जनयत्। सूदयत्। च॥११॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( यत् ) जिस प्रकार (नृपतिम् ) नर रूप नायक, पति अर्थात् पुरुष को (इषे) कामनापूत्ति वा निषेक के निमित्त (तेजः) तेज, वीर्य ( आनट ) प्राप्त होता है तभी वह ( शुचि) शुद्ध, दीप्तियुक्त (रेतः) उत्पादक वीर्य (द्यौ: अभीके) कामना युक्त स्त्री में ( निषिक्तम् ) निपिक्त हो तो (अग्नि) वह तेजस्वी पुरुष (शर्धम् ) बलवान्, (अनवद्यम् ) निर्दोष, अनिन्द्य, सुन्दर ( स्वाध्यम् ) उत्तम विचारानुसार ( युवानम् ) जवान, दीर्घायु हृष्ट-पुष्ट सन्तान को ( जनयत् ) उत्पन्न करता है और (सूदयत् च ) इसी के निमित्त निषेक करता है उसी प्रकार (यत्) जब (इपे) वर्षा के निमित्त या अन्नादि से उत्पन्न होने के लिये राजा के समान नेतृ शक्तियों के पालक या सब मनुष्यों के पालक सूर्य का (तेजः) तेज ( आ आनट् ) सर्वत्र व्याप्त होता है तब और (द्यौ: अभीके) आकाश में सर्वत्र ( शुचि रेतः निषिक्तम् ) शुद्ध जल रूप से गर्भित हो जाता है । तब (अग्नि) वह सूर्य (शर्धम् ) बलकारी ( अनवद्यम् ) निर्दोष (युवानम् ) 'यौवन या बल के वर्धक परस्पर मिश्रित, (स्वाध्यम् ) सुख से स्मरण या "धारण करने योग्य, उत्तम पोषक जल को ( जनयत् ) उत्पन्न करता है और (सूदयत् च) भूमि पर वर्षाता है । (२) राजा जब (इषे) अन्नादि के 'वितरण के लिये राजा का तेज फैलता है (द्यौरभीके) ज्ञान प्रकाश से युक्त राजसभा में विशुद्ध सामर्थ्य को प्रदान करता है और तब (अग्निः) अग्रणी नेता दोषरहित, स्तुतियोग्य, राष्ट्र के यौवन या धारण करने योग्य (दर्शम् ) सामर्थ्य को उत्पन्न करता है और उसको पुनः प्रजा पर ही वर्षा कर देता है।
प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत् ।
सहस्रगुणमुत्सष्टुमादत्ते हि रसं रविः ॥ रघुवंशे ॥
Subject
वीर्यसेचन से पुत्रोत्पत्ति के समान जलसेचन से अन्नादि और राजसामर्थ्य से बल की उत्पत्ति का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
पराशरः । अग्निः । विराट् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥