Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 10

97 Mantra
33/10
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- विराड् गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
विश्वे॑भिः सो॒म्यं मध्वग्न॒ऽइन्द्रे॑ण वा॒युना॑।पिबा॑ मि॒त्रस्य॒ धाम॑भिः॥१०॥

विश्वे॑भिः। सो॒म्यम्। मधु॑। अग्ने॑। इन्द्रे॑ण। वा॒युना॑ ॥ पिब॑। मि॒त्रस्य॑। धाम॑भि॒रिति॒ धाम॑ऽभिः ॥१० ॥

Mantra without Swara
विश्वेभिः सोम्यम्मध्वग्नऽइन्द्रेण वायुना । पिबा मित्रस्य धामभिः ॥

विश्वेभिः। सोम्यम्। मधु। अग्ने। इन्द्रेण। वायुना॥ पिब। मित्रस्य। धामभिरिति धामऽभिः॥१०॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) सूर्य के समान तेजस्विन्! (वायुना) वायु के समान अपने आक्रमण के प्रबल वेग से शत्रुओं को हिला देने वाले (इन्द्रेण) शत्रुघातक सेनापति और (विश्वेभिः) समस्त वीर पुरुषों के साथ मिल कर (मित्रस्य धामभिः) मित्र, स्नेही राजा के पदाधिकारियों सहित ( सोम्यम् ) राष्ट्र के ऐश्वर्य रूप (मधु) मधुर, भोग्य ऐश्वर्य को (पिब ) स्वीकार कर । सूर्य का ताप जैसे रसधारक वायु के साथ किरणों से जल पान कर लेता है उस प्रकार राजा मित्रों सहित सेनापति के बल से राष्ट्र का भोग्य अन्न आदि ऐश्वर्यं प्राप्त करे ।
Subject
वायुसहित सूर्य के जलपान के दृष्टान्त से राजा की ऐश्वर्यप्राप्ति ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
मेधातिथिः । विश्वेदेवाः । विराड् गायत्री । षड्जः ॥