Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 32 / Mantra 12

16 Mantra
32/12
Devata- परमात्मा देवता Rishi- स्वयम्भु ब्रह्म ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी स॒द्यऽ इ॒त्वा परि॑ लो॒कान् परि॒ दि॒शः परि॒ स्वः।ऋ॒तस्य॒ तन्तुं॒ वित॑तं वि॒चृत्य॒ तद॑पश्य॒त् तद॑भव॒त् तदा॑सीत्॥१२॥

परि॑। द्यावा॑पृथि॒वी इति॒ द्यावा॑ऽपृथि॒वी। स॒द्यः। इ॒त्वा। परि॑। लो॒कान्। परि॑। दिशः॑। परि॑। स्व᳖रिति॒ स्वः᳖। ऋ॒तस्य॑। तन्तु॑म्। वित॑त॒मिति॒ विऽत॑तम्। वि॒चृत्येति॑ वि॒ऽचृत्य॑। तत्। अ॒प॒श्य॒त्। तत्। अ॒भ॒व॒त्। तत्। आ॒सी॒त् ॥१२ ॥

Mantra without Swara
परि द्यावापृथिवी सद्यऽइत्वा परि लोकान्परि दिशः परि स्वः । ऋतस्य तन्तुँविततँविचृत्य तदपश्यत्तदभवत्तदासीत् ॥

परि। द्यावापृथिवी इति द्यावाऽपृथिवी। सद्यः। इत्वा। परि। लोकान्। परि। दिशः। परि। स्वरिति स्वः। ऋतस्य। तन्तुम्। विततमिति विऽततम्। विचृत्येति विऽचृत्य। तत्। अपश्यत्। तत्। अभवत्। तत्। आसीत्॥१२॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( द्यावापृथिवी) आकाश और पृथिवी (परि इत्वा ) सब प्रकार से व्याप कर (लोकान् परि इत्वा) समस्त लोकों को व्याप कर ( दिशः परि) समस्त दिशा और (स्व: (परि) परम मोक्षमय सुख को व्याप कर (ऋतस्य) महान् संसार की (विततम् ) व्यापक ( तन्तुम् ) परम आश्रय, मूलकारण प्रकृति तत्व को (विचृत्य) विशेष रूप से बांध कर (तत्) इसको ( अपश्यत् ) देखता है । ( तत् अभवत् ) प्रधान तत्व के साथ संयुक्त होता और ( तत् आसीत् ) इस ब्रह्माण्ड अर्थात् जगत् रूप में प्रकट होता है । अध्यात्म में - ज्ञानयोगी द्यौ और पृथिवी दोनों को समस्त लोकों को और दिशाओं को जान कर, (स्वः) उस सुखमय मोक्ष को प्राप्त करके (ऋतस्य ) सत्यमय परमेश्वर के यज्ञमय प्रजापति के विस्तृत (तन्तुम् ) जन्म मरण के सूत्र को (विचृत्य) काट कर, बन्धन मोक्ष मुक्त होकर ( तत् अपश्यत् ) उस आत्मस्वरूप को साक्षात् करता है ( तत अभवत् ) और तन्मय हो जाता है ( तत् आसीत् ) या उसमें वैसा ही रहता है ।
Subject
तन्मय जगत् ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
परमात्मा । त्रिष्टुप् । धैवतः ॥