Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 31 / Mantra 2

22 Mantra
31/2
Devata- ईशानो देवता Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पुरु॑षऽए॒वेदꣳ सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॑ भाव्यम्।उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥२॥

पुरु॑षः। ए॒व। इ॒दम। सर्व॑म्। यत्। भू॒तम्। यत्। च॒। भा॒व्य᳖म् ॥ उ॒त। अ॒मृ॒तत्वस्येत्य॑मृत॒ऽत्वस्य॑। ईशा॑नः। यत्। अन्ने॑न। अ॒ति॒रोहतीत्य॑ति॒ऽरोह॑ति ॥२ ॥

Mantra without Swara
पुरुष एवेदँ सर्वँयद्भूतञ्यच्च भाव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥

पुरुषः। एव। इदम। सर्वम्। यत्। भूतम्। यत्। च। भाव्यम्॥ उत। अमृतत्वस्येत्यमृतऽत्वस्य। ईशानः। यत्। अन्नेन। अतिरोहतीत्यतिऽरोहति॥२॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( पुरुषः एव) वह जगत् में पूर्ण व्यापक परमेश्वर ही है (यत् भूतम् ) जो जगत् उत्पन्न है ( यत् च ) और जो ( भाव्यम् ) भविष्य में उत्पन्न होगा और ( यत् ) जो (अन्नेन) भोग्य अन्न के समान भोग्य कर्मफल से स्वयं (अति रोहिति) शरीर, स्थावर जंगम रूप पृथिव्यादि पर उत्पन्न होता ( इदं सर्वम् ) इस सबका (उत) और (अमृतत्वस्य) अमृततत्व, मोक्ष या सत्, अविनाशी स्वरूप का (ईशान:) स्वामी, परमेश्वर है । वही सब कुछ रचता है । सायण के मत में—भूत और भव्य सब वही पुरुष है । वही अमृतत्व का स्वामी भी है । वही भोग्य अन्न के निमित्त से जगत् रूप में प्रकट होता है ।
'अन्नेनातिरोहति'—भोग्येन अन्नेननिमित्तभूतेन स्वकीयकारणा- वस्थामतिक्रम्य परिदृश्यमानां जगदवस्थां प्राप्नोति । तस्मात्प्राणिनां कर्मभोगाय जगदवस्थास्वीकारान्नेदम् तस्य वस्तुतत्वम् । इति सायणः ॥
भोग्य अन्न के कारण अपनी कारण-दशा से पार होकर पुरुष दृश्य जगत् का रूप प्राप्त करता है । फल भोग के लिये वह जगत् की दशा में आता है, वह वैसा है नहीं । सायण के मत में ब्रह्म परिणामी हो जाता है। जीवों के कर्म फल भोग के लिये जीव शरीर धारण करे, सो युक्ति- युक्त है । ईश्वर ही स्वयं ब्रह्माण्ड शरीर में बंधे, यह अनुचित है ।
Subject
पुरुष, भूत, भव्य, अमृत के ईशान और अन्नातिरोही ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ईशानः । निचृदनुष्टुप् । गान्धारः ॥