Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 30 / Mantra 11

22 Mantra
30/11
Devata- विद्वान् देवता Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- स्वराडतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अर्मे॑भ्यो हस्ति॒पं ज॒वाया॑श्व॒पं पुष्ट्यै॑ गोपा॒लं वी॒र्य्यायाविपा॒लं तेज॑सेऽजपा॒लमिरा॑यै की॒नाशं॑ की॒लाला॑य सुराका॒रं भ॒द्राय॑ गृह॒पꣳ श्रेय॑से वित्त॒धमाध्य॑क्ष्यायानुक्ष॒त्तार॑म्॥११॥

अर्मे॑भ्यः। ह॒स्ति॒पमिति॑ हस्ति॒ऽपम्। ज॒वाय॑। अ॒श्व॒पमित्य॑श्व॒ऽपम्। पुष्ट्यै॑। गो॒पा॒लमिति॑ गोऽपा॒लम्। वी॒र्य्या᳖य। अ॒वि॒पा॒लमित्य॑विऽपा॒लम्। तेज॑से। अ॒ज॒पा॒लमित्य॑जऽपा॒लम्। इरा॑यै। की॒नाश॑म्। की॒लाला॑य। सु॒रा॒का॒रमिति॑ सुराऽका॒रम्। भ॒द्राय॑। गृ॒ह॒पमिति॑ गृह॒ऽपम्। श्रेय॑से। वि॒त्त॒धमिति॑ वित्त॒ऽधम्। आध्य॑क्ष्यायेत्या॒धि॑ऽअक्ष्याय। अ॒नु॒क्ष॒त्तार॒मित्य॑नुऽक्ष॒त्तार॑म् ॥११ ॥

Mantra without Swara
अर्मेभ्यो हस्तिपञ्जवायाश्वपम्पुष्ट्यै गोपालँवीर्यायाविपालन्तेजसे जपालमिरायै कीनाशङ्कीलालाय सुराकारम्भद्राय गृहपँ श्रेयसे वित्तधमाध्यक्ष्यायानुक्षत्तारम् ॥

अर्मेभ्यः। हस्तिपमिति हस्तिऽपम्। जवाय। अश्वपमित्यश्वऽपम्। पुष्ट्यै। गोपालमिति गोऽपालम्। वीर्य्याय। अविपालमित्यविऽपालम्। तेजसे। अजपालमित्यजऽपालम्। इरायै। कीनाशम्। कीलालाय। सुराकारमिति सुराऽकारम्। भद्राय। गृहपमिति गृहऽपम्। श्रेयसे। वित्तधमिति वित्तऽधम्। आध्यक्ष्यायेत्याधिऽअक्ष्याय। अनुक्षत्तारमित्यनुऽक्षत्तारम्॥११॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(६१) (अर्मेभ्यः ) बड़ी सवारियों के लिये ( हस्तिपम् ) हाथीवान् को नियुक्त कर । (६२) ( जवाय अश्वपम् ) वेग से देशान्तर पहुँचने के लिये अश्वों के पालक पुरुष को नियुक्त करो। (६३) (पुष्ट्ये)अन्न,गोदुग्ध आदि पुष्टिकारक पदार्थों के प्राप्त करने के लिये (गोपालम् ) गौओं के पालक पुरुष को रक्खो । (६४) (वीर्याय अविपालम् ) वीर्य की वृद्धि के लिये भेड़ों के पालने वाले पुरुष को नियुक्त करो । ( ६५) (तेजसे अजपालम् ) तेज, स्फूर्ति की वृद्धि के लिये बकरियों के पालक पुरुष को नियुक्त करो। यहां पशु-पालन के अनुभवी पुरुषों की यह अनुभवसिद्ध बात है कि भैंस का दूध सुस्ती बढ़ाता है, गौ का दूध पुष्टिकारक, भेड़ का दूध वीर्यवर्धक है और बकरी का दूध कान्ति और स्फूर्ति पैदा करता है ।
धन्वन्तरि के मत से:-
गोदुग्ध - पथ्यं रसायनं बल्यं हृद्यं मेध्यं गवां पयः ॥ अजादुग्ध - छागं कषायं मधुरं शीतं ग्राहितरं लघु । अविदुग्ध - आविकं तु पय: स्निग्धं कफपित्तहरं परम् ।
स्थौल्य मेदहरं पथ्यं लोमशं गुरुवृद्धिदम् ॥
(६६) ( इरायै ) अन्न की वृद्धि के लिये ( कीनाशम् ) किसान को नियुक्त कर । (६७) (कीलालाय) अन्न ओषधि के सार-भाग को प्राप्त करने के लिये ( सुराकारम् ) सुरा विधि से भपके द्वारा आसव चुवाने वाले पुरुष को नियत कर । (६८) (भद्राय गृहपम् ) सुख और कल्याण की वृद्धि के लिये गृह पालक पुरुषों को नियुक्त करे । (६९) (श्रेयसे वित्तधम्) सबके कल्याण के लिये धर्म कार्य करने के निमित्त वित्तधारण करने वाले धनाढ्य पुरुषों को प्रेरित कर । ( ७० ) (अध्यक्ष्याय) अध्यक्ष के का' के लिये (अनुक्षत्तारम् ) क्षत्ता अर्थात् अश्वों को चलाने वाले सारथि या कोचवान के समान अपने अधीन पुरुषों को सन्मार्ग पर चलाने वाले पुरुष को नियुक्त करो ।
Subject
ब्रह्मज्ञान, क्षात्रबल, मरुद् ( वैश्य ) विज्ञान आदि नाना ग्राह्य शिल्प पदार्थों की वृद्धि और उसके लिये ब्राह्मण, क्षत्रियादि उन-उन पदार्थों के योग्य पुरुषों की राष्ट्ररक्षा के लिये नियुक्ति । त्याज्य कार्यों के लिये उनके कर्त्ताओं को दण्ड का विधान ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
स्वराडाकृतिः । पंचमः ॥