Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 57

63 Mantra
3/57
Devata- रुद्रो देवता Rishi- बन्धुर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ए॒ष ते॑ रुद्र भा॒गः स॒ह स्वस्राम्बि॑कया॒ तं जु॑षस्व॒ स्वाहै॒ष ते॑ रुद्र भा॒गऽआ॒खुस्ते॑ प॒शुः॥५७॥

ए॒षः। ते॒। रु॒द्र॒। भा॒गः। स॒ह। स्वस्रा॑। अम्बि॑कया। तम्। जु॒ष॒स्व॒। स्वाहा॑। ए॒षः। ते॒। रु॒द्र॒। भा॒गः। आ॒खुः। ते॒। प॒शुः ॥५७॥

Mantra without Swara
एष ते रुद्र भागः सह स्वस्राम्बिकया तञ्जुषस्व स्वाहैष ते रुद्र भाग आखुस्ते पशुः ॥

एषः। ते। रुद्र। भागः। सह। स्वस्रा। अम्बिकया। तम्। जुषस्व। स्वाहा। एषः। ते। रुद्र। भागः। आखुः। ते। पशुः॥५७॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे ( रुद) दुष्ट जनों के रुलाने हारे राजन् ! ( ते एषः भागः ) तेरा यह सेवन करने योग्य अंश है । ( तं ) उसको (स्वस्रा ) अपनी भगिनी, सेवा और (अम्बिकया ) माता , पृथिवी के साथ (जुषस्व ) स्वीकार कर । ( स्वाहा ) यह हमारा उत्तम त्याग है ! हे (रुद्र) विद्वन् ! राजन् ! (ते) तेरा ( एषः ) यह ( भागः ) सेवन करने योग्य अंश है । (आखुः ) भूमि को चारों ओर धातुओं, ओषधियों के खोदने वाले खनक लोग ( ते ) तेरे निमित्त नाना पदार्थों के ( पशुः ) देखने वाले हैं। वे तेरे लिये अभिमत लोह आदि धातु और ओषधि आदि पदार्थ प्राप्त कराते हैं । अथवा हे रुद्र ! विद्वन् ! ( एष ते भागः ) यह तेरा सेवन करने योग्य भाग है । (स्वस्रा अम्बिया ) उत्तम विवेककारिणी वेदवाणी से उसका विवेक करके (जुषस्व) सेवन करो । ( ते पशुः आखुः ) तेरा दर्शनकारी चित्त ही सबको चारों ओर खनन करने हारा है, वह तेरा पशु है । वह तुझे सर्वत्र पहुंचाने वाला साधन है। अध्यात्म में --  हे रुद ! प्राण ! यह अन्न तेरा भाग है । इसे विवेककारिणी वाणी के साथ भोग कर । चारों तरफ व्याप्त वायु या प्राण ही तेरा  , तेरे वाहन के समान है । शत० २ । ६ । २ । १० ॥
Subject
राजा के हाथ पांव श्रमी जन।
Footenote
 ५७ –बन्धुःॠषिः ।द०। 
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रजापतिःऋषिः । रुद्रो देवता । निचृदनुष्टुप् । गांधारः ॥