Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 25

63 Mantra
3/25
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सुबन्धुर्ऋषिः Chhand- भूरिक् बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अग्ने॒ त्वं नो॒ऽअन्त॑मऽउ॒त त्रा॒ता शि॒वो भ॑वा वरू॒थ्यः। वसु॑र॒ग्निर्वसु॑श्रवा॒ऽअच्छा॑ नक्षि द्यु॒मत्त॑मꣳ र॒यिं दाः॑॥२५॥

अग्ने॑। त्वम्। नः॒। अन्त॑मः। उ॒त। त्रा॒ता। शि॒वः। भ॒व॒। व॒रू॒थ्यः᳖। वसुः॑। अ॒ग्निः। वसु॑श्रवा॒ इति॒ वसु॑ऽश्रवाः। अच्छ॑। न॒क्षि॒। द्यु॒मत्त॑म॒मिति॑ द्यु॒मत्ऽत॑मम्। र॒यिम्। दाः॒ ॥२५॥

Mantra without Swara
अग्ने त्वन्नोऽअन्तमऽउत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः । वसुरग्निर्वसुश्रवा अच्छानक्षि द्युमत्तमँ रयिं दाः ॥

अग्ने। त्वम्। नः। अन्तमः। उत। त्राता। शिवः। भव। वरूथ्यः। वसुः। अग्निः। वसुश्रवा इति वसुऽश्रवाः। अच्छ। नक्षि। द्युमत्तममिति द्युमत्ऽतमम्। रयिम्। दाः॥२५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे ( अग्ने ) अग्ने ! अग्रणी राजन् ! ( त्वं नः अन्तमः ) तू हमारे सबसे निकट ( उत) और (त्राता ) रक्षक ( शिवः ) सुखकारी और ( वरूथ्य ) हमारे गृहों के लिये हितकारी बरुध = सेना का पति है। तू ( अग्निः ) सबका नेता होकर भी ( वसुः ) सबको बसाने वाला और ( वसुश्रवाः ) धन ऐश्वर्य के कारण महान् कीर्ति से सम्पन्न है । ( अच्छ नक्षि ) हमें भली प्रकार उत्तम रूप में प्राप्त हो और हमें ( द्युमत्तमम् ) अति उज्ज्वल, ( रयिम्) धन ऐश्वर्य ( दाः ) प्रदान कर ॥ 
ईश्वर पक्ष में- हे परमेश्वर तू हमारे ( अन्तमः ) निकटतम या प्राण- दाताओं में सबसे श्रेष्ठ है । दाता, कल्याणकर, सर्व गुणवान् है । तू ( वसुः ) सर्वत्र बसने वाला, सबको बसाने वाला सर्वत्र व्यापक है । तू हमें सर्वोत्तम उज्ज्वल ऐश्वर्य दे ॥
Subject
राजा प्रजा का रक्षक होने का कर्त्तव्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
[२५ -२८] बन्ध्वादयश्चत्वा-ऋषयः, अग्निदेवता । भुरिग् बृहती । मध्यमः ॥