Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 24

63 Mantra
3/24
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वैश्वामित्रो मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- विराट् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स नः॑ पि॒तेव॑ सू॒नवेऽग्ने॑ सूपाय॒नो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥२४॥

सः। नः॒। पि॒तेवेति॑ पि॒ताऽइ॑व। सू॒नवे॑। अग्ने॑। सू॒पा॒य॒न इति॑ सुऽउ॒पा॒य॒नः। भ॒व॒। सच॑स्व। नः॒। स्व॒स्तये॑ ॥२४॥

Mantra without Swara
स नः पितेव सूनवे ग्ने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये ॥

सः। नः। पितेवेति पिताऽइव। सूनवे। अग्ने। सूपायन इति सुऽउपायनः। भव। सचस्व। नः। स्वस्तये॥२४॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे राजन् !अग्ने ! प्रभो ! अग्रणी पुरुष ! ( सः ) वह तू ( सूनवे ) पुत्र के लिये पिता के समान (सूपायन: भव ) सुखपूर्वक प्राप्त होने योग्य, शरण के समान पालक हों और ( नः स्वस्तये ) हमारे कल्याण के लिये ( नः सचस्व ) हमें प्राप्त हो । राजा प्रजा के प्रति पिता के समान हो । उनके कल्याण के लिये कार्य में नियुक्त हो । ईश्वर के प्रति स्पष्ट है ॥
 
Subject
राजा का परमेश्वर के समान प्रजा के प्रति पिता के तुल्य होने का उपदेश।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
वैश्वामित्रो मधुच्छन्दाऋषिः । अग्निर्देवता । विराड् गायत्री । षड्जः ॥