Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 36

60 Mantra
29/36
Devata- अग्निर्देवता Rishi- भार्गवो जमदग्निर्ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒द्यो जा॒तो व्य॑मिमीत य॒ज्ञम॒ग्निर्दे॒वाना॑मभवत् पुरो॒गाः।अ॒स्य होतुः॑ प्र॒दिश्यृ॒तस्य॑ वा॒चि स्वाहा॑कृतꣳ ह॒विर॑दन्तु दे॒वाः॥३६॥

स॒द्यः। जा॒तः। वि। अ॒मि॒मी॒त॒। य॒ज्ञम्। अ॒ग्निः। दे॒वाना॑म्। अ॒भ॒व॒त्। पु॒रो॒गा इति॑ पुरः॒ऽगाः। अ॒स्य। होतुः॑। प्र॒दिशीति॑ प्र॒ऽदिशि॑। ऋ॒तस्य॑। वा॒चि। स्वाहा॑कृतमिति॒ स्वाहा॑ऽकृतम्। ह॒विः। अ॒द॒न्तु॒। दे॒वाः ॥३६ ॥

Mantra without Swara
सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानामभवत्पुरोगाः । अस्य होतुः प्रदिश्यृतस्य वाचि स्वाहाकृतँ हविरदन्तु देवाः ॥

सद्यः। जातः। वि। अमिमीत। यज्ञम्। अग्निः। देवानाम्। अभवत्। पुरोगा इति पुरःऽगाः। अस्य। होतुः। प्रदिशीति प्रऽदिशि। ऋतस्य। वाचि। स्वाहाकृतमिति स्वाहाऽकृतम्। हविः। अदन्तु। देवाः॥३६॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(अग्नि) अग्नि जिस प्रकार ( यज्ञ वि अमिमीत ) यज्ञ को विविध रूपों में प्रकट करता है और वह अग्नि ही ( देवानां पुरोगाः अभवत् ) समस्त वायु आदि दिव्य पदार्थों का अग्रगामी है और (अस्य वाचि स्वाहा कृते हविः देवा: अदन्ति ) इस अग्नि की ज्वाला में स्वाहा किये हुए हविष को अन्य वायु, जल आदि भी प्राप्त करते हैं उसी प्रकार ( अग्निः ) अग्रणी ज्ञान पुरुष जो ( देवानाम् ) विद्वानों और विजय की कामना करने वाले और व्यवहारकुशल पुरुषों का ( पुरोगाः ) अग्रगामी, नेता ( अभवत् ) हो जाता है । वह ( सद्यः जातः) शीघ्र ही सामर्थ्यवान् होकर ( यज्ञम् ) परस्पर सुसंगत, सुव्यवस्थित, प्रजापालन करने वाले राष्ट्र का (वि अमिमीत) विशेष और विविध प्रकारों में निर्माण करता है। (अस्य होतुः ) सबको यथायोग्य पदाधिकार प्रदान करने वाले इस विद्वान् के (प्रदिशि) उत्कृष्ट शासन में और (ऋतस्य वाचि) सत्य व्यवहार, या ज्ञान, शासन- विधान की वाणी या आज्ञा के अधीन रहकर (देवाः) सुख चाहने वाले विद्वान् शासक सैनिक और प्रजागण, ( स्वाहाकृतम् ) उत्तम आदर से प्रदान किये (हविः) अन्न और भोग्य पदार्थ को (अदन्तु ) भोग करें ।
Subject
यज्ञाग्नि की ज्वाला से हव्य के विस्तार के समान राजा के सत्य, न्यायवाणी पर समस्त प्रजाओं का सुखभोग ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अग्निः । निचृत् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥