Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 12

60 Mantra
29/12
Devata- यजमानो देवता Rishi- भार्गवो जमदग्निर्ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यदक्र॑न्दः प्रथ॒मं जाय॑मानऽउ॒द्यन्त्स॑मु॒द्रादु॒त वा॒ पुरी॑षात्।श्ये॒नस्य॑ प॒क्षा ह॑रि॒णस्य॒ बा॒हूऽउ॑प॒स्तुत्यं॒ महि॑ जा॒तं ते॑ऽअर्वन्॥१२॥

यत्। अक्र॑न्दः। प्र॒थ॒मम्। जाय॑मानः। उ॒द्यन्नित्यु॒त्ऽयन्। स॒मु॒द्रात्। उ॒त। वा॒। पुरी॑षात्। श्ये॒नस्य॑। प॒क्षा। ह॒रि॒णस्य॑। बा॒हूऽइति॑ बा॒हू। उ॒प॒स्तुत्य॒मित्यु॑प॒ऽस्तुत्य॑म्। महि॑। जा॒तम्। ते॒ अ॒र्व॒न् ॥१२ ॥

Mantra without Swara
यदक्रन्दः प्रथमञ्जायमान उद्यन्त्समुद्रादुत वा पुरीषात् । श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहूऽउपस्तुत्यम्महि जातन्तेऽअर्वन् ॥

यत्। अक्रन्दः। प्रथमम्। जायमानः। उद्यन्नित्युत्ऽयन्। समुद्रात्। उत। वा। पुरीषात्। श्येनस्य। पक्षा। हरिणस्य। बाहूऽइति बाहू। उपस्तुत्यमित्युपऽस्तुत्यम्। महि। जातम्। ते अर्वन्॥१२॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे ( अर्वन् ) वेग से प्रयाण करनेहारे राजन् ! (यत्) जब तू ( समुद्रात् उद्यन् ) समुद्र से ऊपर उठते हुए सूर्यं या मेघ के समान उदय को प्राप्त होकर (प्रथमं जायमानः) पहले-पहल उत्पन्न होकर, राजा बनाया जाकर (वा) और ( पुरीषात् ) ऐश्वर्य से ऊपर उठता हुआ, उन्नत राजपद पर विराजता हुआ (अक्रन्दः) शब्द करता, आज्ञा प्रदान करता है, गर्जना या घोषणा करता है उस समय तेरी ( पक्षा ) दोनों बाजू ( श्येनस्य) बाज पक्षी के समान अति वेग से शत्रु पर आक्रमण करने में समर्थ दायें बायें दो सेनाओं के दस्ते (Wings) और (हरिणस्य) हरिण की ( बाहू) भगली टांगों के समान अति शीघ्रगामी दो सेनादल समान शत्रुपीड़न में समर्थ दोनों बाहू आगे होते हैं और उस समय (ते) तेरा स्वरूप (महि) बहुत अधिक ( उपस्तुत्यं जातम् ) वर्णन करने योग्य हो जाता है ।
Subject
उदयः होते सूर्य, बाज और वेगवान् हरणि के समान सेनानायक का स्तुत्य रूप ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
[ १२–२३ ] भार्गवो जमदग्निर्दीर्घतमाश्च ऋषी । अश्वस्तुतिः । यजमानः. त्रिष्टुप् । धैवतः॥