Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 27 / Mantra 21

45 Mantra
27/21
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- विराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
वन॑स्प॒तेऽव॑ सृजा॒ ररा॑ण॒स्त्मना॑ दे॒वेषु॑।अ॒ग्निर्ह॒व्यꣳ श॑मि॒ता सू॑दयाति॥२१॥

वन॑स्पते। अव॑। सृ॒ज॒। ररा॑णः। त्मना॑। दे॒वेषु॑। अ॒ग्निः। ह॒व्यम्। श॒मि॒ता। सू॒द॒या॒ति॒ ॥२१ ॥

Mantra without Swara
वनस्पतेवसृजा रराणस्त्मना देवेषु । अग्निर्हव्यँ शमिता सूदयाति ॥

वनस्पते। अव। सृज। रराणः। त्मना। देवेषु। अग्निः। हव्यम्। शमिता। सूदयाति॥२१॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे (वनस्पते) सेवन करने योग्य राष्ट्र के पालक ! (शमिता) शान्तिदायक, राष्ट्र के उपद्रवों को शान्त करने में समर्थ, (अग्नि) अग्नि के समान तेजस्वी, सेनानायक ( हव्यम् ) ग्रहण करने योग्य राष्ट्र आदि ऐश्वर्य को ( सूदयाति) तुझे प्रदान करे । और तू (त्मना ) स्वयं (देवेषु) विद्वान्, विजयशील पुरुषों के हाथों उसको (रराणः) प्रदान करता हुआ (अब सृज) उसको अपने अधीन रख ।
Subject
अग्नि और वाग्मी नाम विद्वानों का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
विद्वांसः । विराड् उष्णिक् । ऋषभः ॥