Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 6

47 Mantra
25/6
Devata- मरुतादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदतिधृतिः Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म॒रुता॑ स्क॒न्धा विश्वे॑षां दे॒वानां॑ प्रथ॒मा कीक॑सा रु॒द्राणां॑ द्वि॒तीया॑ऽऽदि॒त्यानां॑ तृ॒तीया॑ वा॒योः पुच्छ॑म॒ग्नीषोम॑यो॒र्भास॑दौ॒ क्रुञ्चौ॒ श्रोणि॑भ्या॒मिन्द्रा॒बृह॒स्पती॑ऽऊ॒रुभ्यां॑ मि॒त्रावरु॑णाव॒ल्गाभ्या॑मा॒क्रम॑ण स्थू॒राभ्यां॒ बलं॒ कुष्ठा॑भ्याम्॥६॥

म॒रुता॑म्। स्क॒न्धाः। विश्वे॑षाम्। दे॒वाना॑म्। प्र॒थ॒मा। कीक॑सा। रु॒द्राणा॑म्। द्वि॒ताया॑। आ॒दि॒त्याना॑म्। तृ॒तीया॑। वा॒योः। पुच्छ॑म्। अ॒ग्नीषोम॑योः। भास॑दौ। क्रुञ्चौ॑। श्रोणि॑भ्या॒मिति॒ श्रोणि॑ऽभ्याम्। इन्द्रा॒बृह॒स्पती॒ इतीन्द्रा॒बृह॒स्पती॑। ऊ॒रुभ्या॒मित्यू॒रुऽभ्या॑म्। मि॒त्रावरु॑णौ। अ॒ल्गाभ्या॑म्। आ॒क्रम॑ण॒मित्या॒ऽक्रम॑णम्। स्थू॒राभ्या॑म्। बल॑म्। कुष्ठा॑भ्याम् ॥६ ॥

Mantra without Swara
मरुताँ स्कन्धा विश्वेषान्देवानाम्प्रथमा कीकसा रुद्राणान्द्वितीयादित्यानान्तृतीया वायोः पुच्छमग्नीषोमयोर्भासदौ क्रुञ्चौ श्रोणिभ्यामिन्द्राबृहस्पतीऽऊरुभ्याम्मित्रावरुणावल्गाभ्यामाक्रमणँ स्थूराभ्याम्बलं कुष्ठाभ्याम् ॥

मरुताम्। स्कन्धाः। विश्वेषाम्। देवानाम्। प्रथमा। कीकसा। रुद्राणाम्। द्विताया। आदित्यानाम्। तृतीया। वायोः। पुच्छम्। अग्नीषोमयोः। भासदौ। क्रुञ्चौ। श्रोणिभ्यामिति श्रोणिऽभ्याम्। इन्द्राबृहस्पती इतीन्द्राबृहस्पती। ऊरुभ्यामित्यूरुऽभ्याम्। मित्रावरुणौ। अल्गाभ्याम्। आक्रमणमित्याऽक्रमणम्। स्थूराभ्याम्। बलम्। कुष्ठाभ्याम्॥६॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( मरुतां स्कन्धाः) जैसे शरीर में कन्धे हैं वैसे ही राष्ट्र में "मरुत' अर्थात् शत्रु को वायुवेग से झपट कर मारने वाले वीर सेनाओं कों ( स्कन्धाः ) स्कन्धावार या छावनियां हैं ( विश्वेषां देवानाम् ) समस्त विद्वान् पुरुषों की (प्रथमा) सबसे प्रथम, सर्वोत्तम (कीकसा) उपदेश क्रिया प्रथम 'कीकसा' अर्थात् कूल्हे की पहली मोहरी के समान आधार है । (रुद्राणां द्वितीया) रुद्र अर्थात् दुष्टों को रुलाने वाले दमनकारी पुरुषों की शासन व्यवस्था दूसरी मोहरी के समान है ।( तृतीया आदित्यानाम् ) आदित्य के समान तेजस्वी अखण्डित शासनकारी अधीशों का शासन तीसरी मोहरी के समान है । ( वायो: पुच्छम् ) 'वायु' न्यायाधीश का पद शरीर में पूंछ के समान राष्ट्र का आश्रय वा दुष्ट पुरुषों का नाशक है। (अग्नि-सोमयोः) अग्नि, अग्रणी सेनापति और सोम, ऐश्वर्यवान् राजा यह दोनों तेजस्वी पदाधिकारी राष्ट्र के (भासदौ) दो नितम्ब भागों के समान राष्ट्र के अधार हैं। (क्रुञ्चौ) हंसों के समान विशेष विवेकी, दो विद्वान ( श्रोणिभ्याम्) राष्ट्र के कटिप्रदेशों से तुलना करते हैं । (इन्द्र-बृहस्पती) इन्द्र और बृहस्पति, राजा और मंत्री दोनों (ऊरुभ्याम् ) राष्ट्र के दो जांघों ( अल्गाभ्याम्) अति वेग से गमन करने वाले ऊरुओं के दो सन्धि भागों से (मित्रावरुणौ ) मित्र और वरुण इन दो पदाधिकारियों की तुलना है । (आक्रमणम्) राष्ट्र का विजयार्थ आक्रमण करने की ( स्थूराभ्याम् ) स्थूल जांघों के भागों से तुलना है । ( कुष्ठाभ्याम् ) जांघ चूतड़ दोनों के बीच के गहरे स्थानों से ( बलम ) राष्ट्र के सैन्य बल की तुलना है ।
Subject
देह के पीठ के मोहरों से राज्याधिकारियों की तुलना और उनके कर्तव्य- विवेचन | उदर में स्थित अंगों से राष्ट्र के अन्य पदार्थों की तुलना । अथवा उनकी शक्तियों से उनके उपयोगों की आलोचना ।
Footenote
६ – मित्रावरुणा अल्गा० इति काण्व ० ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
मरुदादयः । निचृदतिधृतिः । षड्जः ॥