Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 26

47 Mantra
25/26
Devata- यज्ञो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ए॒ष छागः॑ पु॒रोऽअश्वे॑न वा॒जिना॑ पू॒ष्णो भा॒गो नी॑यते वि॒श्वदे॑व्यः।अ॒भि॒प्रियं॒ यत्पु॑रो॒डाश॒मर्व॑ता॒ त्वष्टेदे॑नꣳ सौश्रव॒साय॑ जिन्वति॥२६॥

ए॒षः। छागः॑। पु॒रः। अश्वे॑न। वा॒जिना॑। पू॒ष्णः। भा॒गः। नी॒य॒ते॒। वि॒श्वदे॑व्य॒ इति॑ वि॒श्वऽदे॑व्यः॒। अ॒भि॒प्रिय॒मित्य॑भि॒ऽप्रिय॑म्। यत्। पु॒रो॒डाश॑म्। अर्व॑ता। त्वष्टा॑। इत्। ए॒नम्। सौ॒श्र॒व॒साय॑। जि॒न्व॒ति॒ ॥२६ ॥

Mantra without Swara
एष च्छागः पुरोऽअश्वेन वाजिना पूष्णो भागो नीयते विश्वदेव्यः । अभिप्रियँयत्पुरोडाशमर्वता त्वष्टेदेनँ सौश्रवसाय जिन्वति ॥

एषः। छागः। पुरः। अश्वेन। वाजिना। पूष्णः। भागः। नीयते। विश्वदेव्य इति विश्वऽदेव्यः। अभिप्रियमित्यभिऽप्रियम्। यत्। पुरोडाशम्। अर्वता। त्वष्टा। इत्। एनम्। सौश्रवसाय। जिन्वति॥२६॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जब (विश्वदेव्यः ) समस्त विजयी पुरुषों से, श्रेष्ठ, सब विद्वानों का हितकारी (एषः) यह (छागः) शत्रुओं का छेदन-भेदन करने हारा, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न विभागों में बांटने वाला पुरुष ( वाजिना) ऐश्वर्य युक्त (अश्वेन) राष्ट्र के द्वारा ( पुरः) सबके आगे, सबसे प्रथम, (पूष्णः ) पूषा, सर्व राष्ट्रपोषक के पद को (भागः ) सेवन करने वाला ( नीयते) प्राप्त किया जाता है तब (त्वष्ट्रा इत्) त्वष्ट्रा, शत्रुनाशक सेनापति ही (अर्वता) व्यापक राष्ट्र के सहित विद्यमान, ( अभिप्रियम् ) सबको प्रिय लगने वाले ( पुरोडाशम् ) सबसे प्रथम देने योग्य पदाधिकार को ( सौश्रवसाय) उत्तम कीर्त्ति के लिये (जिन्वति ) पूर्ण करता या राजा को प्रदान करता है ।
Subject
प्रधान वीरपुरुषों के कर्तव्य । पूषा के विश्वदेव्य भाग, छाग और उनका अश्व के साथ आगे चलने का रहस्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
यज्ञः । निचृज्जगती । निषादः ॥