Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 1

47 Mantra
25/1
Devata- सरस्वत्यादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिक्छक्वरी, निचृतदतिशक्वरी Swara- धैवतः, पञ्चमः
Mantra with Swara
शादं॑ द॒द्भिरव॑कां दन्तमू॒लैर्मृदं॒ बर्स्वै॑स्ते॒ गां दष्ट्रा॑भ्या॒सर॑स्वत्याऽअग्रजि॒ह्वं जि॒ह्वाया॑ऽ उत्सा॒दम॑वक्र॒न्देन॒ तालु॒ वाज॒ꣳहनु॑भ्याम॒पऽआ॒स्येन॒ वृष॑णमा॒ण्डाभ्या॑मादि॒त्याँ श्मश्रु॑भिः॒ पन्था॑नं भ्रू॒भ्यां द्यावा॑पृथि॒वी वर्त्तो॑भ्यां वि॒द्युतं॑ क॒नीन॑काभ्या शु॒क्राय॒ स्वाहा॑ कृ॒ष्णाय॒ स्वाहा॒ पार्या॑णि॒ पक्ष्मा॑ण्यवा॒र्याऽइ॒क्षवो॑ऽवा॒र्याणि॒ पक्ष्मा॑णि॒ पार्या॑ इ॒क्षवः॑॥१॥

शाद॑म्। द॒द्भिरिति॑ द॒त्ऽभिः। अव॑काम्। द॒न्त॒मू॒लैरिति॑ दन्तऽमू॒लैः। मृद॑म्। बर्स्वैः॑। ते॒। गाम्। दष्ट्रा॑भ्याम्। सर॑स्वत्यै। अ॒ग्र॒जि॒ह्वमित्य॑ग्रऽजि॒ह्वम्। जि॒ह्वायाः॑। उ॒त्सा॒दमित्यु॑त्ऽसा॒दम्। अ॒व॒क्रन्देनेत्य॑वऽक्र॒न्देन॑। तालु॑। वाज॑म्। हनु॑भ्या॒मिति॒ हनु॑ऽभ्याम्। अ॒पः। आ॒स्ये᳖न। वृष॑णम्। आ॒ण्डाभ्या॑म्। आ॒दि॒त्यान्। श्मश्रु॑भि॒रिति॒ श्मश्रु॑ऽभिः। पन्था॑नम्। भ्रू॒भ्याम्। द्यावा॑पृथि॒वी इति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। वर्त्तो॑भ्या॒मिति॒ वर्त्तः॑ऽभ्याम्। वि॒द्युत॑मिति॒ वि॒ऽद्युत॑म्। क॒नीन॑काभ्याम्। शु॒क्राय॑। स्वाहा॑। कृ॒ष्णाय॑। स्वाहा॑। पार्या॑णि। पक्ष्मा॑णि। अ॒वा॒र्याः᳖। इ॒क्षवः॑। अ॒वा॒र्या᳖णि। पक्ष्मा॑णि। पार्याः॑। इ॒क्षवः॑ ॥१ ॥

Mantra without Swara
शादन्दद्भिरवकान्दन्तमूलैर्मृदम्बर्स्वैस्तेगान्दँष्ट्राभ्याढँ सरस्वत्याऽअग्रजिह्वञ्जिह्वायाऽउत्सादमवक्रन्देन तालु वाजँ हनुभ्यामपऽआस्येन वृषणमाण्डाभ्यामात्याँश्मश्रुभिः पन्थानम्भ्रूभ्यान्द्यावापृथिवी वर्ताभ्याँविद्युतङ्कनीनकाभ्याँ शुक्लाय स्वाहा कृष्णाय स्वाहा पार्याणि पक्ष्माण्यवार्या इक्षवो वार्याणि पक्ष्माणि पार्या इक्षवः ॥

शादम्। दद्भिरिति दत्ऽभिः। अवकाम्। दन्तमूलैरिति दन्तऽमूलैः। मृदम्। बर्स्वैः। ते। गाम्। दष्ट्राभ्याम्। सरस्वत्यै। अग्रजिह्वमित्यग्रऽजिह्वम्। जिह्वायाः। उत्सादमित्युत्ऽसादम्। अवक्रन्देनेत्यवऽक्रन्देन। तालु। वाजम्। हनुभ्यामिति हनुऽभ्याम्। अपः। आस्येन। वृषणम्। आण्डाभ्याम्। आदित्यान्। श्मश्रुभिरिति श्मश्रुऽभिः। पन्थानम्। भ्रूभ्याम्। द्यावापृथिवी इति द्यावापृथिवी। वर्त्तोभ्यामिति वर्त्तःऽभ्याम्। विद्युतमिति विऽद्युतम्। कनीनकाभ्याम्। शुक्राय। स्वाहा। कृष्णाय। स्वाहा। पार्याणि। पक्ष्माणि। अवार्याः। इक्षवः। अवार्याणि। पक्ष्माणि। पार्याः। इक्षवः॥१॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(शादं दद्भिः) काटने की क्रिया को दांतों से सीखो । (दन्त- मूलैः) दांतों के मूल भागों से ( अवकाम् ) रक्षा करने की विधि का प्रयोग सीखें । (बर्स्वैः मृदम्) दांतों के पृष्ठ- भागों से मर्दन करने की क्रिया सीखें कि वे चबाये पदार्थ को कैसे मसलते हैं । ( दंष्ट्राभ्यां गाम् ) दाढ़ों से तीक्ष्णता का ज्ञान करें । ( सरस्वत्यै अग्रजिह्वम् ) सरस्वती, शुद्ध वाणी के उच्चारण के लिये जिह्वा के अग्रभाग का उपयोग करें। (जिह्वायाः) जीभ से ( उत्सादम् ) उखाड़ने के व्यापार की शिक्षा लो । वह चतुरता से दांतों में फंसे अन्नादि के अंशों को कैसे उखाड़ती है । (अवक्रन्देन तालुं) नीचे शब्द के प्रयोग से (तालु) तालु का प्रयोग सीखो । ( हनुभ्यामवाजम् ) दोनों जवाड़ों से बल की शिक्षा लो, वे वस्तु को कैसी दृढ़ता से पकड़ते हैं । (आस्येन अपः) मुख से जलों के प्रकट होने का विज्ञान देखो, किस प्रकार मुख में लगी ग्रन्थियों से जल छूटता है और नित्य सदा मुख जल से गीला रहता है । ( आण्डाभ्याम् वृषणम् ) अण्डकोषों से वीर्य सेचन का ज्ञान प्राप्त करो । ( श्मश्रुभिः) दाढ़ी मोंछ के बालों से (आदित्यान् ) आदित्य ब्रह्मचारियों को पहिचानो, अथवा दाढ़ी मोंछे के बालों से सूर्य की किरणों को जानो । अर्थात् मुख पर दाढ़ी मोंछे सूर्यविम्ब के चारों ओर उससे निकलने वाली किरणों के समान हैं, ( भ्रूभ्याम् पन्थानम् ) भौंहों से मार्ग को जानो, जैसे नाक पर दो भौहें एक दूसरे के विपरीत दिशा में लगी हैं जैसे भिन्न-भिन्न दिशा में गये मार्गों को सूचित करें । अथवा (भ्रूभ्याम् ) भौंहों के इशारे से ही ( पन्थानम् ) जाने योग्य मार्ग को समझो | बुद्धिमान् को इशारों से ही अपनी कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य जानना चाहिये । ( वत्तभ्यां द्यावापृथिवी ) ऊपर नीचे की पलकों से आकाश और पृथिवी को जाने। जैसे दो पलके ऊपर नीचे हैं वे चक्षु को अपने भीतर लिये हैं उसी प्रकार आकाश ऊपर और पृथिवी नीचे वे दोनों दो पलकों के समान सूर्य रूप तेज को अपने भीतर धारण करती हैं । ( कनीनकाभ्याम् ) आंख की पुतलियों से ( विद्युतम् ) या विशेष द्युतिमय सूर्य को समझो । पलकों के बीच की पुतली आकाश और भूमि के बीच विशेष तेजस्वी सूर्यवत् है । (शुक्लाय स्वाहा ) आंख के शुक्ल भाग का भी ज्ञान करो और (कृष्णाय स्वाहा) कृष्ण भाग का भी ज्ञान करो । वे दोनों दिन और रात्रि के प्रकाश और अन्धकार के समान चक्षु के तेज के रक्षक हैं । (पक्ष्माणि) पलकों पर के लोम (पार्याणि) नदी के परले तट पर लगे कासों के समान हैं । (इक्षवः) नीचे की पलकों के लोम (अवार्याणि) मानो इस तीर के कासों के समान हैं । अथवा (पक्ष्माणि) स्वीकार करने योग्य वस्तु (पार्याणि) पालन करने योग्य हैं । (इक्षवः) इच्छानुकूल पदार्थ (अवार्याणि) वारण नहीं करने चाहिये । और इसी प्रकार ( पक्ष्माणि अवार्याणि) अपने पक्ष के, ग्रहण योग्यों को तिरस्कार न किया जाय । (इक्षवः पार्या) इष्ट सम्बन्धियों को पालन करना चाहिये । (२) इस मन्त्र में राष्ट्र की मनुष्य के मुंह से तुलना भी है । जैसे (शादं दद्भिः) 'शाद' अर्थात् छेदन करने वाले शस्त्र बल की दांतों से तुलना करो । ( अवकां) शैवाल को दन्तमूलों से तुलना करो। अथवा काटने वाले हथियारों की दांतों से । राष्ट्र की रक्षा करने वाली सेना को दांतों के मूलों के तुल्य मानो । (तेगां दंष्ट्राभ्याम् ) तीक्ष्ण शस्त्र की दाढ़ों से, ( सरस्वत्या अग्रजिह्नम् ) सरस्वती या विद्वसमिति से मुखस्थ जीभ की और ( जिह्वायाः उत्सादम् ) मुख में लगी जीभ की राष्ट्र में शत्रु को उखाड़ देने की शक्ति से तुलना करो । (अवक्रन्देन) शत्रु को ललकारने वाले या दबाने वाले बल से (तालु) तालु की जैसे भोज्य पदार्थ को तालु दबा लेता है उसी प्रकार राजा भोग्य राष्ट्र को दबाकर भोग करे । ( वाजं हनुभ्याम् ) राष्ट्र के बल वीर्य की मुख के जबाड़ों से । (अप: आस्येन) राष्ट्र में स्थिर जलों की (आस्येन) गीले मुख से, अथवा (अप: आस्येन) प्रजाओं की समस्त खाने वाले मुख से तुलना करो । ( वृषणम् आण्डाभ्याम् ) शरीर में स्थित अण्डकोशों से वर्षा करने वाले मेघ की, (आदित्यान् श्मश्रुभिः) सूर्य की किरणों की मुख के मूंछ दाढी से, ( पन्थानं भ्रूभ्याम् ) राष्ट्र में बने मार्ग की मुख पर लगी भौंहों से, (वत्तभ्यां द्यावापृथिवी) दो पलकों से आकाश और पृथिवी की और (विद्युतं कनीनकाभ्याम् ) आकाश पृथिवी के बीच स्थित विशेष कान्तिवाले सूर्य या विद्युत् की आंखों की पुतलियों से, तुलना करो। (शुक्लाय स्वाहा कृष्णाय स्वाहा, शुक्रेन शुकुं सुष्ठु आह । कृष्णेन कृष्णं सुष्ठु उच्यते । अथवा, शुक्कुः शुक्लं स्वम् उपमानमाह कृष्णः कृष्णं स्वम् उपमानम् आह) आंख के श्वेत भाग और कृष्ण भाग के लिये भी दिन और रात्रि के शुक्ल और कृष्ण, प्रकाश और अन्धकार दोनों की उत्तम रीति से तुलना करों । ( पक्ष्माणि पार्याणि) ऊपर के पलक के लोम राष्ट्र के पालन करने वाले अथवा दूर देश वासी जन के समान हैं । और (इक्षवः) निचली पलक के रोम (अवार्याणि) समीप के प्रान्तों के वासी जनों के समान हैं । अथवा इससे विपरीत ( पक्ष्माणि भवार्याणि पार्या इक्षवः) ऊपर की पलकों के लोम पास के प्रान्तों की प्रजा और नीचे के पलक के रोम दूर के प्रान्तों की प्रजा के समान हैं ।
Subject
नाना प्रकार के शिल्पों तथा गुणों और रहस्यमय पदार्थों के ज्ञान के लिये शरीरगत अंगों का दृष्टान्तरूप से उल्लेख ।
Footenote
१ - शांद दद्भिरित्यारभ्य पृथिवीं त्वचा [ २५ । ] इत्यन्तः संहिता भागो ब्राह्मणं न मन्त्राः इति महीधरः ॥
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
सरस्वत्यादयः । ( १ ) भुरिक शक्वरी ( २ ) निचृदतिशक्वरी । धैवतः ॥