Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 56

65 Mantra
23/56
Devata- समाधाता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- स्वराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ॒जारे॑ पिशङ्गि॒ला श्वा॒वित्कु॑रुपिशङ्गि॒ला।श॒शऽआ॒स्कन्द॑मर्ष॒त्यहिः॒ पन्थां॒ वि स॑र्पति॥५६॥

अ॒जा। अ॒रे॒। पि॒श॒ङ्गि॒ला। श्वा॒वित्। श्व॒विदिति॑ श्व॒ऽवित्। कु॒रु॒पिश॒ङ्गि॒लेति॑ कुरुऽपिशङ्गि॒ला। श॒शः। आ॒स्कन्द॒मित्या॒ऽस्कन्द॑म्। अ॒र्ष॒ति॒। अहिः॑। पन्था॑म्। वि। स॒र्प॒ति॒ ॥५६ ॥

Mantra without Swara
अजारे पिशङ्गिला श्वावित्कुरुपिशङ्गिला । शशऽआस्कन्दमर्षत्यहिः पन्थाँविसर्पति ॥

अजा। अरे। पिशङ्गिला। श्वावित्। श्वविदिति श्वऽवित्। कुरुपिशङ्गिलेति कुरुऽपिशङ्गिला। शशः। आस्कन्दमित्याऽस्कन्दम्। अर्षति। अहिः। पन्थाम्। वि। सर्पति॥५६॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(अरे) हे प्रश्नकर्त्तः ! सुन, (पिशङ्गिला) समस्त रूपों को अपने भीतर निगल जाने वाली (अजा) 'अजा', प्रकृति है । वह स्वत:कारण समस्त कार्य पदार्थों को विलीन कर लेती है ।( श्वावित् ) सेही धान्यादि अन्न को खा जाती है उसी प्रकार 'श्वा' कुत्ते के समान विषय रस भोग्य पदार्थों को प्राप्त करने वाला जीव, (कुरुपिशङ्गिला) अपने कर्मों से उत्पादित रूपों को धारण करता है इसलिये वह 'कुरुपिशंगिला' है । (शशः) शासक के तुल्य कूद-कूद कर चलने वाला, सबको क्षीण करने वाला काल 'शश' है वह ( आस्कदम् ) सब पदार्थों पर आक्रमण करता हुआ (अर्षति) जाता है । (अहिः) सर्प जैसे सरकता जाता है उसी प्रकार मेघ ( पन्थाम् ) आकाश मार्ग में (विसर्पति) जाता है । अथवा (अहिः) अविनाशी जीवात्मा (पन्थाम् विसर्पति) अपने मार्ग में जाता है।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
समाधाता देवता । प्रतिवचनानि । स्वराड् उष्णिक् । ऋषभः ॥