Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 40

65 Mantra
23/40
Devata- प्रजा देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ऋ॒तव॑स्तऽऋतु॒था पर्व॑ शमि॒तारो॒ विशा॑सतु।सं॒व॒त्स॒रस्य॒ तेज॑सा श॒मीभिः॑ शम्यन्तु त्वा॥४०॥

ऋ॒तवः॑। ते॒। ऋ॒तु॒थेत्यृ॑तु॒ऽथा। पर्व॑। श॒मि॒तारः॑। वि। शा॒स॒तु॒। सं॒व॒त्स॒रस्य॑। तेज॑सा। श॒मीभिः॑। श॒म्य॒न्तु॒। त्वा॒ ॥४० ॥

Mantra without Swara
ऋतवस्त्वाऽऋतुथा पर्व शमितारो वि शासतु । सँवत्सरस्य तेजसा शमीभिः शम्यन्तु त्वा ॥

ऋतवः। ते। ऋतुथेत्यृतुऽथा। पर्व। शमितारः। वि। शासतु। संवत्सरस्य। तेजसा। शमीभिः। शम्यन्तु। त्वा॥४०॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(ऋतवः) सत्यज्ञानवान्, राजसभा के सदस्यगण, (ऋतुथा) अपने ज्ञान के अनुसार (शमितारः) शान्तिदायक होकर (पर्व) प्रजापालन करने के कार्य का (वि शासतु) विविध रूपों से उपदेश या शासन करें। और(संवत्सरस्य) समस्त प्राणियों और लोकों को बसाने वाले सर्वाश्रय राजा के ( तेजसा ) तेज, बल पराक्रम से ( शमीभिः) शान्तिदायक उपायों से हे राष्ट्र (त्वा) तुझे (शम्यन्तु ) शान्ति प्रदान करें, सुख पहुँचावें । सदस्या ऋतवोऽभवन् । तै० ३|१२|९|४॥ ऋतवो वै विश्वेदेवाः । यजु ० १२।६१ ॥ ऋतवो वै वाजिनः । कौ० ५२॥ ऋतौ वै सोमस्य राज्ञो राजभ्रातरो यथा मनुष्यस्य । ऐ० १|१३|| जिस प्रकार कलात्मक संवत्सर में ऋतुएं हैं उसी प्रकार राजा के अधीन विद्वान्, कार्यकुशल मुख्य राजसभासद्, शासक पुरुष 'ऋतु' हैं । वे सदा प्रजापालन के नये-नये उपाय सोचें ।
Subject
विद्वान् सदस्यों का शान्तिविधान का कर्तव्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
प्रजाः, ऋतवो देवताः । अनुष्टुप् । गान्धारः ॥