Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 31

65 Mantra
23/31
Devata- राजप्रजे देवते Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यद्ध॑रि॒णो यव॒मत्ति॒ न पु॒ष्टं ब॒हु मन्य॑ते।शू॒द्रो यदर्या॑यै जा॒रो न पोष॒मनु॑ मन्यते॥३१॥

यत्। ह॒रि॒णः। यव॑म्। अत्ति॑। न। पु॒ष्टम्। ब॒हु॒। मन्य॑ते। शू॒द्रः। यत्। अर्य्या॑यै। जा॒रः। न। पोष॑म्। अनु॑। म॒न्य॒ते॒ ॥३१ ॥

Mantra without Swara
यद्धरिणो यवमत्ति न पुष्टम्बहु मन्यते । शूद्रो यदर्यायै जारो न पोषमनुमन्यते ॥

यत्। हरिणः। यवम्। अत्ति। न। पुष्टम्। बहु। मन्यते। शूद्रः। यत्। अर्य्यायै। जारः। न। पोषम्। अनु। मन्यते॥३१॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जो (हरिण:) हरिण के समान राजा ( यवम् ) यव के समान प्रजाजन को खा लेता है वह राजा ( पुष्टम् ) पुष्ट प्रजाजन को (बहु) अधिक आवश्यक ( न मन्यते) नहीं जानता । इसी प्रकार (शूद्रः) शूद्र वर्ण का पुरुष, नौकर ( यत् ) जो (अर्यायै जारः) श्रेष्ठ गृहस्वामिनी का भोग करता है वह भी ( पोषम ) अपने भरण पोषण की आजीविका पर (न अनुमन्यते) विचार नहीं करता । अर्थात् जो राजा अपनी प्रजा को लूट कर पीड़ित करके खाता है वह उस हरिण के समान है जो खेत में लगे जौ को खा जाता है और खेत के जौ को बढ़ने नहीं देता । इसी प्रकार वह राजा उस शूद्र, नौकर के समान है जो व्यभिचार से घर की मालकिन का भोग करके उसका, उसके यश का नाश कर देता है और उसकी कीर्ति और लक्ष्मी की परवाह नहीं करता । व्यसनी राजा दुराचारी भृत्य के समान समृद्ध प्रजा को लूट खसोट के दरिद्र कर देता है, उसकी समृद्धि को बढ़ने नहीं देता और प्रजा के आचार, व्यवहार, मान ,धन सबका नाश करता है ।
Subject
हरिण और यव तथा भृत्य और रानी के भोग के दृष्टान्त से दुष्ट राजा के द्वारा उत्तम प्रजा के नाश हो जाने की चेतावनी ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
राजप्रजे देवते । अनुष्टुप् । गान्धारः ॥