Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 23 / Mantra 19

65 Mantra
23/19
Devata- गणपतिर्देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- शक्वरी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ग॒णानां॑ त्वा ग॒णप॑तिꣳहवामहे प्रि॒याणां॑ त्वा प्रि॒यप॑तिꣳहवामहे निधी॒नां त्वा॑ निधि॒पति॑ꣳ हवामहे वसो मम। आहम॑जानि गर्भ॒धमा त्वम॑जासि गर्भ॒धम्॥१९॥

ग॒णाना॑म्। त्वा॒। ग॒णप॑ति॒मिति॑ ग॒णऽप॑तिम्। ह॒वा॒म॒हे॒। प्रि॒याणा॑म्। त्वा॒। प्रि॒यप॑ति॒मिति॑ प्रि॒यऽप॑तिम्। ह॒वा॒म॒हे॒। नि॒धी॒नामिति॑ निऽधी॒नाम्। त्वा॒। नि॒धि॒पति॒मिति॑ निधि॒ऽपति॑म्। ह॒वा॒म॒हे॒। व॒सो॒ऽइति॑ वसो। मम॑। आ। अ॒हम्। अ॒जा॒नि॒। ग॒र्भ॒धमिति॑ गर्भ॒ऽधम्। आ। त्वम्। अ॒जा॒सि॒। ग॒र्भ॒धमिति॑ गर्भ॒ऽधम् ॥१९ ॥

Mantra without Swara
गणानान्त्वा गणपतिँ हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपतिँ हवामहे निधीनान्त्वा निधिपतिँ हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥

गणनाम्। त्वा। गणपतिमिति गणऽपतिम्। हवामहे। प्रियाणाम्। त्वा। प्रियपतिमिति प्रियऽपतिम्। हवामहे। निधीनामिति निऽधीनाम्। त्वा। निधिपतिमिति निधिऽपतिम्। हवामहे। वसोऽइति वसो। मम। आ। अहम्। अजानि। गर्भधमिति गर्भऽधम्। आ। त्वम्। अजासि। गर्भधमिति गर्भऽधम्॥१९॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे (वसो) जगत्, राष्ट्र को बसाने हारे ! राजन् ! हे विद्वन् ! प्रभो ! हम (त्वा) तुझको ( गणानाम् ) समस्त गणों का ( गणपतिम् ) गणपति, गणनायक, (हवामहे ) स्वीकार करते हैं । ( प्रियाणाम् ) सब प्रिय पदार्थों का तुझको ( प्रियपतिम् ) प्रियपति, पालक (हवामहे ) स्वीकार करते हैं । और ( निधीनाम् ) समस्त खजानों का तुझको (निधिपतिम् ) निधिपति, कोशपाल, (हवामहे ) स्वीकार करते हैं । हे (वसो) राष्ट्र को बसाने हारे राजन् ! तू (मम) मुझ राष्ट्र-प्रजा का पति है ( अहम् ) मैं प्रजा ( गर्भधम् ) 'गर्भ' = ग्रहण या वश करने के सामर्थ्य को धारने वाले तुझ स्वामी को (आ अजानि) प्राप्त होती हूँ। तू ( गर्भधम् ) ऐश्वर्यों को धारने वाली मुझे (अजासि) प्राप्त हो ।
( २ ) पति पत्नी के पक्ष में — हे पते ! मैं समस्त गणों में गणपति, प्रियजनों में प्रियपति, 'ऐश्वर्यों का 'निधिपति' तुझको ही कहती हूँ। मैं गर्भ धारण कराने में समर्थ तुझको (आ अजानि) प्राप्त होती हूँ । गर्भ धारण में समर्थ, उर्वरा मुझ पत्नी को तू प्राप्त हो ।
(३) परमेश्वर सबका गणपति, प्रियपति और निधिपति हैं । प्रकृति हिरण्यगर्भ को धारण करने वाले मैं ( आ अजानि) प्राप्त होती हूँ और (गर्भधम् ) संसार को अपने में अव्यक्त रूप में धारण करने वाली प्रकृति को (त्वम् अजासि) तू प्राप्त होता, स्पन्दित करता और सृष्टि को उत्पन्न करता है । अथवा ( अहम् ) मैं जीव ( गर्भधम् ) हिरण्यगर्भ के धारक, संसार को अपने बीच धारने वाली प्रकृति का भी धर्त्ता तुझको प्राप्त होऊं ।
‘गर्भधं’—गर्भधारकं कलत्ररूपं इति सायणः । तै० ब्रा० भा० । 'गर्भधात्री' इति सायणः । तै० सं० भा० ॥
Subject
गणपति, परमेश्वर, विद्वान्, राजा और गृहपति का वर्णन, गर्भध परमेश्वर और गर्भध प्रकृति का रहस्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
गणपतिर्देवता । शक्वरी । धैवतः ॥