Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 30

34 Mantra
22/30
Devata- वस्वादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- कृतिः Swara- निषादः
Mantra with Swara
अस॑वे॒ स्वाहा॒ वस॑वे॒ स्वाहा॑ वि॒भुवे॒ स्वाहा॒ विव॑स्वते॒ स्वाहा॑ गण॒श्रिये॒ स्वाहा॑ ग॒णप॑तये॒ स्वाहा॑भि॒भुवे॒ स्वाहाधि॑पतये॒ स्वाहा॑ शू॒षाय॒ स्वाहा॑ सꣳस॒र्पाय॒ स्वाहा॑ च॒न्द्राय॒ स्वाहा॒ ज्योति॑षे॒ स्वाहा॑ मलिम्लु॒चाय॒ स्वाहा॒ दिवा॑ प॒तये॒ स्वाहा॑॥३०॥

अस॑वे। स्वाहा॑। वस॑वे। स्वाहा॑। वि॒भुव॒ इति॑ वि॒ऽभुवे॑। स्वाहा॑। विव॑स्वते। स्वाहा॑। ग॒ण॒श्रिय॒ इति॑ गण॒ऽश्रिये॑। स्वाहा॑। ग॒णप॑तय॒ इति॑ ग॒णऽप॑तये। स्वाहा॑। अ॒भि॒भुव॒ इत्य॑भि॒ऽभुवे॑। स्वाहा॑। अधि॑पतय॒ इ॒त्यधि॑ऽपतये। स्वाहा॑। शू॒षाय॑। स्वाहा॑। स॒ꣳस॒र्पायेति॑ सम्ऽस॒र्पाय॑। स्वाहा॑। च॒न्द्राय॑। स्वाहा॑। ज्योति॑षे। स्वाहा॑। म॒लि॒म्लु॒चाय॑। स्वाहा॑। दिवा॑। प॒तये॑। स्वाहा॑ ॥३० ॥

Mantra without Swara
असवे स्वाहा वसवे स्वाहा विभुवे स्वाहा विवस्वते स्वाहा गणश्रिये स्वाहा गणपतये स्वाहाभिभुवे स्वाहाधिपतये स्वाहा शूषाय स्वाहा सँसर्पाय स्वाहा चन्द्राय स्वाहा ज्योतिषे स्वाहा मलिम्लुचाय स्वाहा दिवा पतयते स्वाहा ॥

असवे। स्वाहा। वसवे। स्वाहा। विभुव इति विऽभुवे। स्वाहा। विवस्वते। स्वाहा। गणश्रिय इति गणऽश्रिये। स्वाहा। गणपतय इति गणऽपतये। स्वाहा। अभिभुव इत्यभिऽभुवे। स्वाहा। अधिपतय इत्यधिऽपतये। स्वाहा। शूषाय। स्वाहा। सꣳसर्पायेति सम्ऽसर्पाय। स्वाहा। चन्द्राय। स्वाहा। ज्योतिषे। स्वाहा। मलिम्लुचाय। स्वाहा। दिवा। पतये। स्वाहा॥३०॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(असवे स्वाहा ) शरीर के रोगों को बाहर फेंकने वाले 'प्राण' की हम उत्तम साधना करें। ( वसवे स्वाहा ) शरीर में बसने वाले जीव की उत्तम साधना करें। (विभुवे स्वाहा) व्यापक वायु की साधना और परमेश्वर की हम उपासना करें। (विवस्वते स्वाहा) विविध वसु, वास योग्य लोकों को धारण करने वाले उनके स्वामी सूर्य को हम सुखकारी बनावे | इसी प्रकार शत्रु को बाहर निकालने के लिये अस्त्रों को फेंकने वाला 'असु' प्रजा को बसाने वाला 'बसु', विशेष सामर्थ्यवान् 'विभु', विविध ऐश्वर्यों से युक्त 'विवस्वान्', इन सब प्रकार के उत्तम पुरुषों का आदर करें। (गणश्रिये) गण, संघ, सैनिक संघ से सुशोभित, संघों में सुशोभित सैनिकों को उत्तम अन्न आदि पदार्थ प्राप्त हों । (गणपतये स्वाहा ) उन गणों के पालक का उत्तम आदर हो । ( अभिभुवे स्वाहा ) सम्मुख जाने वाले का और (अधिपतये) अधिपति का उत्तम मान हो । ( शुपाय स्वाहा ) सैन्य बल की उत्तम वृद्धि और विजय लाभ हो । ( संसर्पाय स्वाहा ) शत्रुगण में गुप्त रूप से फैल कर उनके भेद लेने वालों को उत्तम जीविका प्राप्त हो । (चन्द्राय स्वाहा ) आह्लादकारी पुरुष को ( ज्योतिषे ) दीप्ति प्रकाश के उत्पादक को उत्तम पद प्राप्त हो । ( मलिम्लुचाय स्वाहा ) मारामारी करके दूसरे के धन हरण करने वाले दुष्ट पुरुष का अच्छा दमन हो । और (दिवापतये स्वाहा ) दिन के पालक अथवा दिन के समय दूर तक चलने वाले पथिक की उत्तम रक्षा हो ।
Subject
नक्षत्र आदि के सुखकारी होने की भावना ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अस्वादयो देवताः कृतिः । निषादः ॥