Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 3

34 Mantra
22/3
Devata- अग्निर्देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒भि॒धाऽअ॑सि॒ भुव॑नमसि य॒न्तासि॑ ध॒र्त्ता। स त्वम॒ग्निं वै॑श्वान॒रꣳ सप्र॑थसं गच्छ॒ स्वाहा॑कृतः॥३॥

अ॒भि॒धा इत्य॑भि॒ऽधाः। अ॒सि॒। भुव॑नम्। अ॒सि॒। य॒न्ता। अ॒सि॒। ध॒र्त्ता। सः। त्वम्। अ॒ग्निम्। वै॒श्वा॒न॒र॒म्। सप्र॑थस॒मिति॒ सऽप्र॑थसम्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑कृत॒ इति॒ स्वाहा॑ऽकृतः ॥३ ॥

Mantra without Swara
अभिधाऽअसि भुवनमसि यन्तासि धर्ता । स त्वमग्निँवैश्वानरँ सप्रथसङ्गच्छ स्वाहाकृतः ॥

अभिधा इत्यभिऽधाः। असि। भुवनम्। असि। यन्ता। असि। धर्त्ता। सः। त्वम्। अग्निम्। वैश्वानरम्। सप्रथसमिति सऽप्रथसम्। गच्छ। स्वाहाकृत इति स्वाहाऽकृतः॥३॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! तू (अभिधाः असि) समस्त पदार्थों को बत- लाने, उनको नियम में बांधने वाला है। तू (भुवनम् असि ) जल के समान समस्त चराचर लोकों को प्राण देने वाला है । तृ (यन्ता असि) संसार का नियन्ता, तू (धर्त्ता) सबका धारण करने वाला है । (सः) वह तू ( सप्रथसम् ) अति विस्तृत शक्ति से युक्त (वैश्वानरम् ) समस्त ब्रह्माण्ड को चलाने वाली प्रवर्त्तक शक्तियों के सञ्चालक ( अग्निम् ) ज्ञानरूप, तेजोमय, स्वतः प्रकाश, सर्वप्रकाश सूर्य आदि को भी (स्वाहाकृतः) उत्तम गुणकीर्त्तनों और सत्य वाणियों द्वारा स्तुति किया जाकर (गच्छ) व्याप्त है ।
राजा के पक्ष में-राजा (अभिधाः) ज्ञानों को उपदेश करने वाला या राष्ट्र को सब प्रकार से बांधने या प्रबन्ध करने में समर्थ है (भुवनम् ) सबका आश्रय, (यन्ता) नियामक और ( धर्त्ता) कर्त्ता, धर्त्ता, धारण करने हारा है । ( सः त्वम् ) वह (स्वाहाकृतः) उत्तम स्तुति यश से सम्पन्न होकर, ( सप्रथसम् ) अति विस्तृत यश से युक्त, ( वैश्वानरम् ) समस्त जनों के हितकारी (अग्निम् ) अग्रणी, नेता, पद को (गच्छ) प्राप्त हो । शत० १३ । १ । २ । ३॥
Subject
परमेश्वर के गुणों का वर्णन, पक्षान्तर में राजा के गुणों का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अग्निर्देवता । भुरिग् अनुष्टुप् । गान्धारः ॥