Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 15

34 Mantra
22/15
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सुतम्भर ऋषिः Chhand- निचृदगायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ग्निꣳ स्तोमे॑न बोधय समिधा॒नोऽअम॑र्त्यम्। ह॒व्या दे॒वेषु॑ नो दधत्॥१५॥

अ॒ग्निम्। स्तोमे॑न। बो॒ध॒य॒। स॒मि॒धा॒न इति॑ सम्ऽइधा॒नः। अम॑र्त्यम्। ह॒व्या। दे॒वेषु॑। नः॒। द॒ध॒त्॥१५ ॥

Mantra without Swara
अग्निँ स्तोमेन बोधय समिधानोऽअमर्त्यम् । हव्या देवेषु नो दधत् ॥

अग्निम्। स्तोमेन। बोधय। समिधान इति सम्ऽइधानः। अमर्त्यम्। हव्या। देवेषु। नः। दधत्॥१५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे पुरुष ! ( अमर्त्यम् ) अविनाशी, कारणरूप से नित्य ( अग्निम् ) अग्नि को जैसे ( स्तोमेन) काष्ठ समूह से जलाया जाता है उसमें (हव्या) हव्य, चरु, पदार्थ दिये जाते हैं उसी प्रकार तू (सम् इधानः) ज्ञान से प्रदीप्त भी ( स्तोमेन) स्तुतियों द्वारा ( अमर्त्यम् ) मरण- धर्म से रहित, (अग्निम् ) अग्नि, स्वतः प्रकाश तेजोमय आत्मा को (बोधय ) ज्ञान से प्रदीप्त कर । और (नः देवेषु) हमारे देव, प्राणों, विद्वानों में भी ( हव्या) ग्रहण योग्य अन्न आदि पदार्थों व गुणों को ( दधत् ) धारण करा ।
Subject
अग्नि अर्थात् विद्वान् दूत का वर्णन, अध्यात्म में ज्ञानी उपासक का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
[ १५ – १७ ] अग्निर्देवता । सुतम्भर विश्वामित्रविश्वरूपा ऋषयः । गायत्री । षड्जः ॥