Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 9

61 Mantra
21/9
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र बा॒हवा॑ सिसृतं जी॒वसे॑ न॒ऽआ नो॒ गव्यू॑तिमुक्षतं घृ॒तेन॑।आ मा॒ जने॑ श्रवयतं युवाना श्रु॒तं मे॑ मित्रावरुणा॒ हवे॒मा॥९॥

प्र। बा॒हवा॑। सि॒सृ॒त॒म्। जी॒वसे॑। नः॒। आ। नः॒। गव्यू॑तिम्। उ॒क्ष॒त॒म्। घृ॒तेन॑। आ। मा। जने॑। श्र॒व॒य॒त॒म्। यु॒वा॒ना॒। श्रु॒तम्। मे॒। मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒। हवा॑। इ॒मा ॥९ ॥

Mantra without Swara
प्र बाहवा सिसृतञ्जीवसे नऽआ नो गव्यूतिमुक्षतङ्घृतेन । आ मा जने श्रवयतँयुवाना श्रुतम्मे मित्रावरुणा हवेमा ॥

प्र। बाहवा। सिसृतम्। जीवसे। नः। आ। नः। गव्यूतिम्। उक्षतम्। घृतेन। आ। मा। जने। श्रवयतम्। युवाना। श्रुतम्। मे। मित्रावरुणा। हवा। इमा॥९॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे (मित्रावरुणा ) मित्र, सबके स्नेही एवं मरण से त्राण- कारिन् ! और हे वरुण, दुष्टों के वारक ! तुम दोनों (नः जीवसे) हम प्रजाजनों के जीवन की रक्षा के लिये (ब्राहवा) अपने बाहुओं, शत्रुगण या विपक्षों के बाधक, पीड़क अस्त्रादि साधनों और वीरों को ( प्र सिसृतम् . ) आगे बढ़ाओ । जिस प्रकार शरीर रक्षार्थ बाहुएं आगे बढ़ती हैं उसी प्रकार प्रजा रक्षार्थ क्षत्रिय लोग आगे बढ़े। और (घृतेन) मेघ जैसे जल से पृथिवी को सींचता है, वैसे आप दोनों अधिकारी (नः) हमारे ( गव्यू- तिम् ) राष्ट्र के प्रति दो कोस भूमि को (घृतेन ) जलवत् प्राणप्रद या - तेजस्वी विद्वान् और वीर क्षत्रिय गण से (आ उक्षतम् ) सर्वत्र पुष्ट करो | हे ( युवानौ ) सदा युवाओ ! अथवा संधि और विग्रह, मेल और फूट -कराने में कुशल पुरुषो ! आप दोनों (जने) समस्त राष्ट्र जन के बीच (मा) मुझको राजा, शासक रूप से ( आ श्रवयतम् ) आघोषित कर दो और (मे) मेरी (इमा हवा) इन आज्ञाओं की ( श्रुतम् ) श्रवण करो ।
राजा, और अधिकारियों को अपने राज्य में प्रति दो कोस में राज्य -की चौकी, प्याऊ, पाठशाला, धर्मस्थान आदि बनाने की आज्ञा दे, प्रजा की रक्षा के लिये बाहुवत् वे प्रजा की रक्षा करें, वे राजा की आज्ञा - आघोषित करें, उसकी आज्ञा पर ध्यान दें और पालन करें ।
Subject
मित्र और वरुण पदों के कर्त्तव्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
वसिष्ठ ऋषिः । मित्रावरुणौ देवते । त्रिष्टुप् । धैवतः ॥