Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 6

61 Mantra
21/6
Devata- अदितिर्देवता Rishi- गयप्लात ऋषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒त्रामा॑णं पृथि॒वीं द्याम॑ने॒हस॑ꣳ सु॒शर्मा॑ण॒मदि॑तिꣳ सु॒प्रणी॑तिम्।दै॒वीं नाव॑ꣳ स्वरि॒त्रामना॑गस॒मस्र॑वन्ती॒मा रु॑हेमा स्व॒स्तये॑॥६॥

सु॒त्रामा॑ण॒मिति॑ सु॒ऽत्रामा॑णम्। पृ॒थि॒वीम्। द्याम्। अ॒ने॒हस॑म्। सु॒शर्म्मा॑ण॒मिति॑ सु॒ऽशर्मा॑णम्। अदि॑तिम्। सु॒प्रणी॑तिम्। सु॒प्रनी॑ति॒मिति॑ सु॒ऽप्रनी॑तिम्। दैवी॑म्। नाव॑म्। स्व॒रि॒त्रामिति॑ सुऽअरि॒त्राम्। अना॑गसम्। अस्र॑वन्तीम्। आ। रु॒हे॒म॒। स्व॒स्तये॑ ॥६ ॥

Mantra without Swara
सुत्रामाणम्पृथिवीन्द्यामनेहसँ सुशर्माणमदितिँ सुप्रणीतिम् । देवीन्नावँ स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये ॥

सुत्रामाणमिति सुऽत्रामाणम्। पृथिवीम्। द्याम्। अनेहसम्। सुशर्म्माणमिति सुऽशर्माणम्। अदितिम्। सुप्रणीतिम्। सुप्रनीतिमिति सुऽप्रनीतिम्। दैवीम्। नावम्। स्वरित्रामिति सुऽअरित्राम्। अनागसम्। अस्रवन्तीम्। आ। रुहेम। स्वस्तये॥६॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(सुत्रामाणम्) उत्तम रीति से रक्षा करने वाली, (पृथिवीम् ) अति विस्तृत, ( द्याम् ) ज्ञान प्रकाश से युक्त, ( अनेहसम् ) गौ के समान - नाश न करने योग्य, क्रोधरहित ( सुशर्माणम् ) उत्तम भवन या शरणप्रद सुखसाधनों से युक्त, ( सुप्रणीतिम् ) उत्तम राजा प्रजा की नीति से युक्त, ( सु-अरि-त्राम् ) उत्तम रीति से शत्रु से प्रजा की रक्षा करने वाली, ( अस्रवन्तीम् ) अपना रहस्य शत्रु को न देने वाली, छिद्ररहित, ( अनागसम् ) अपराधरहित निर्दोष, ( दैवीम् ) विद्वानों की बनी हुई ( नावम् ) नाव के समान समस्त कष्टों को पार उतारने और सबको सन्मार्ग में चलाने वाली ( अदितिम् ) दूसरों के उपजाप आदि के प्रयोगों से अदपण्डित, एकदम फूट से रहित राजसभा या राज्य व्यवस्था का ( स्वस्तये ) सुख और कल्याण प्राप्त करने के लिये (आ रुहेम) आश्रय लें। नाव के पक्ष में वह डूबने से बचाने वाली, विस्तृत, निर्दोष, उथल- उथल न होने - वाली, उत्तम घर-युक्त तथा डूबते को बचाने के साधनों वाली, उत्तम रचना और चाल वाली, उत्तम संचालन के प्रबन्ध वाली, उत्तम पतवारों - वाली, निर्दोष, मृत्यु भादि के भय से रहित, बिना छिद्र की, जल को भीतर आने न देने वाली, विद्वानों की बनाई नाव को हम सुखवृद्धि के लिये चढ़े। 'सुत्रामा' इन्द्र का वर्णन पूर्व अध्याय में सौत्रामणी प्रकरण में आ चुका है। यहां उसी प्रजापालक राजशक्ति एवं विद्वत्सभा का नौका रूप से श्लेष से वर्णन है यह मन्त्र पृथिवी और सूर्यपक्ष में भी लगता है ।
Subject
राजसभा और राज्यव्यवस्था की नौका के साथ तुलना कर्त्तव्यदृष्टि से उसका उत्तम स्वरूप ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
गयप्लात ऋषिः । अदितिर्देवता । भुरिक् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥