Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 34

61 Mantra
21/34
Devata- अश्व्यादयो देवताः Rishi- स्वस्त्यात्रेय ऋषिः Chhand- विराडतिधृतिः Swara- षड्जः
Mantra with Swara
होता॑ यक्ष॒द् दुरो॒ दिशः॑ कव॒ष्यो न व्यच॑स्वतीर॒श्विभ्यां॒ न दुरो॒ दिश॒ऽइन्द्रो॒ न रोद॑सी॒ दुघे॑ दु॒हे धे॒नुः सर॑स्वत्य॒श्विनेन्द्रा॑य भेष॒जꣳ शु॒क्रं न ज्योति॑रिन्द्रि॒यं पयः॒ सोमः॑ परि॒स्रुता॑ घृ॒तं मधु॒ व्यन्त्वाज्य॑स्य॒ होत॒र्यज॑॥३४॥

होता॑। य॒क्ष॒त्। दुरः॑। दिशः॑। क॒व॒ष्यः᳕। न। व्यच॑स्वतीः। अ॒श्विभ्या॒मित्य॒श्विऽभ्या॑म्। न। दुरः॑। दिशः॑। इन्द्रः॑। न। रोद॑सी॒ऽइति॒ रोद॑सी। दुघ॒ऽइति॒ दुघे॑। दु॒हे। धे॒नुः। सर॑स्वती। अ॒श्विना॑। इन्द्रा॑य। भे॒ष॒जम्। शु॒क्रम्। न। ज्योतिः॑। इ॒न्द्रि॒यम्। पयः॑। सोमः॑। प॒रि॒स्रुतेति॑ परि॒ऽस्रुता॑। घृ॒तम्। मधु॑। व्यन्तु॑। आज्य॑स्य। होतः॑। यज॑ ॥३४ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षद्दुरो दिशः कवष्यो न व्यचस्वतीरश्विभ्यान्न दुरो दिशऽइन्द्रो न रोदसी दुघे दुहे धेनुः सरस्वत्यश्विनेन्द्राय भेषजँ शुक्रन्न ज्योतिरिन्द्रियम्पयः सोमः परिस्रुता घृतम्मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज ॥

होता। यक्षत्। दुरः। दिशः। कवष्यः। न। व्यचस्वतीः। अश्विभ्यामित्यश्विऽभ्याम्। न। दुरः। दिशः। इन्द्रः। न। रोदसीऽइति रोदसी। दुघऽइति दुघे। दुहे। धेनुः। सरस्वती। अश्विना। इन्द्राय। भेषजम्। शुक्रम्। न। ज्योतिः। इन्द्रियम्। पयः। सोमः। परिस्रुतेति परिऽस्रुता। घृतम्। मधु। व्यन्तु। आज्यस्य। होतः। यज॥३४॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( होता यक्षत् ) उक्त होता, विद्वान् अश्वि दो नामक अधिकारी और सरस्वती विद्वत्सभा को नियुक्त करे । (इन्द्रः ) ऐश्वर्यवान् राजा (अश्विभ्याम्) उक्त दोनों कुशल अधिकारियों द्वारा (दिश: ब) दिशाओं के समान ( कवण्यः ) विशाल अवकाशवाली और ( व्यचस्वतीः ) अति विस्तृत (दुरः ) द्वारों के समान ( दिशः ) अवकाश वाली विस्तृत दिशाओं को और (रोदसी न) सूर्य, चन्द्र या वायु और सूर्य द्वारा अवकाश और पृथ्वी जिस प्रकार दुही जाती है, उनके उपभोग्य पदार्थ प्राप्त किये जाते हैं, उसी प्रकार विद्वान् नेता और सूर्य के समान तेजस्वी पुरुषों द्वारा राष्ट्रवासी स्त्री पुरुषों या राजा प्रजावर्ग दोनों को (दुघे) दोहे, उनसे ऐश्वर्य प्राप्त करे । (सरस्वती) सरस्वती, विद्वत्सभा (इन्द्राय) राजा के लिये ( पयः ) दूध को (धेनुः) दुधार गौ के समान ( भेषजम् ) सर्व रोग हर औषध, (शुक्रम् ) शरीर, में बलकारी वीर्य और (ज्योतिः) प्रकाश और (इन्द्रियम्) ऐश्वर्य उत्पन्न करे । इसी प्रकार ( अश्विनौ ) शरीर में व्यापक प्राण और अपान के समान दोनों अधिकारी ( इन्द्राय ) शरीर के अधिष्ठाता, इन्द्र, जीव के समान राष्ट्र के स्वामी के लिये (भेषजं शुक्रं न) सर्व रोगहर औषध और वीर्य के समान ऐश्वर्य और (ज्योतिः) जीवन- बल और (इन्द्रियम् ),राज्य सामर्थ्य को (दुहे) उत्पन्न करें। (पयः सोमः परिस्रुता ० ) इत्यादि पूर्ववत् ॥
Subject
अधिकार प्रदान और नाना दृष्टान्तों से उनके और उनके सहायकों के कर्तव्यों का वर्णन । अग्नि, तनूनपात्, नराशंस, बर्हि, द्वार, सरस्वती, उषा, नक्ता, दैव्य होता, तीन देवी, त्वष्टा, वनस्पति, अश्विद्वय इन पदाधिकारियों को अधिकारप्रदान ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
भुरिगतिधृतिः । षड्जः ॥