Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 21 / Mantra 1

61 Mantra
21/1
Devata- वरुणो देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒मं मे॑ वरुण श्रु॒धी हव॑म॒द्या च॑ मृडय। त्वाम॑व॒स्युरा च॑के॥१॥

इम॒म्। मे॒। व॒रु॒ण॒। श्रु॒धि। हव॑म्। अ॒द्य। च॒। मृ॒ड॒य॒। त्वाम्। अ॒व॒स्युः। आ। च॒के॒ ॥१ ॥

Mantra without Swara
इमम्मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय । त्वामस्वस्युरा चके ॥

इमम्। मे। वरुण। श्रुधि। हवम्। अद्य। च। मृडय। त्वाम्। अवस्युः। आ। चके॥१॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे (वरुण) वरण करने योग्य ! सर्वश्रेष्ठ (मे) मेरी, मुझ प्रजाजन की ( हवम् ) स्तुति, पुकार को (श्रुधि) श्रवण कर और (अद्य च) भाज और सदा हमें (मृडय) सुखी कर । (अवस्युः) रक्षा चाहता हुआ मैं ( त्वाम् ) तुझे अपना रक्षक (आचके) चाहता हूँ ।
Subject
प्रजा की प्रार्थना सुनने का राजा का कर्त्तव्य, पक्षान्तर में परमेश्वर का स्मरण ।
Footenote
टिप्पणी १ – ' ० मृडय ' ० इति काण्व० ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
शुनःशेष ऋषिः । गायत्री । षड्जः ॥