Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 70

90 Mantra
20/70
Devata- इन्द्रसवितृवरुणा देवताः Rishi- विदर्भिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यऽइन्द्र॑ऽइन्द्रि॒यं द॒धुः स॑वि॒ता वरु॑णो॒ भगः॑।स सु॒त्रामा॑ ह॒विष्प॑ति॒र्यज॑मानाय सश्चत॥७०॥

ये। इन्द्रे॑। इ॒न्द्रि॒यम्। द॒धुः। स॒वि॒ता। वरु॑णः। भगः॑। सः। सु॒त्रामेति॑ सु॒ऽत्रामा॑। ह॒विष्प॑तिः। ह॒विःप॑ति॒रिति॑ ह॒विःऽप॑तिः। यज॑मानाय। स॒श्च॒त॒ ॥७० ॥

Mantra without Swara
यऽइन्द्र इन्द्रियन्दधुः सविता वरुणो भगः । स सुत्रामा हविष्पतिर्यजमानाय सश्चत ॥

ये। इन्द्रे। इन्द्रियम्। दधुः। सविता। वरुणः। भगः। सः। सुत्रामेति सुऽत्रामा। हविष्पतिः। हविःपतिरिति हविःऽपतिः। यजमानाय। सश्चत॥७०॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( सविता ) उत्पादक या अभिषेककर्त्ता, (वरुणः) राजा का वारण करने वाला, (सविता ) सूर्य के समान तेजस्वी पुरुष सबका आज्ञापक, (वरुणः) राष्ट्र की विपत्तियों का निवारक, सेनापति और (भगः ) ऐश्वर्यवान् कोषाध्यक्ष ये तीनों मिलकर (इन्द्रे) ऐश्वर्यवान् शत्रुविजयी इन्द्र पद के योग्य पुरुष में ( इन्द्रियम् ) इन्द्रपद के योग्य ऐश्वर्य और बल को (दधुः) स्थापन करते हैं । (सः) वह (सुत्रामा) राष्ट्र की उत्तम रीति से रक्षा करनेहारा (हविष्पतिः) समस्त ग्राह्य पदार्थों का स्वामी होकर (यजमानाय ) दानशील, करप्रद माण्डलिक पूजनीय प्रजाजन के लाभ के लिये उस राजपद को (सश्चतु) प्राप्त करे ।
Subject
उषा, नक्त, अश्वि, तीन देवियां, सविता, वरुण का इन्द्र पद को पुष्ट करना ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
[ ७०-७२ ] इन्द्रमवितृवरुणा देवताः । अनुष्टुप् । गांधारः ॥