Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 57

90 Mantra
20/57
Devata- अश्विसरस्वतीन्द्रा देवताः Rishi- विदर्भिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इन्द्रा॒येन्दु॒ꣳ सर॑स्वती॒ नरा॒शꣳसे॑न न॒ग्नहु॑म्।अधा॑ताम॒श्विना॒ मधु॑ भेष॒जं भि॒षजा॑ सु॒ते॥५७॥

इन्द्रा॑य। इन्दु॑म्। सर॑स्वती। नरा॒शꣳसे॑न। न॒ग्नहु॑म्। अधा॑ताम्। अ॒श्विना॑। मधु॑। भे॒ष॒जम्। भि॒षजा॑। सु॒ते ॥५७ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रायेन्दुँ सरस्वती नराशँसेन नग्नहुम् । अधातामश्विना मधु भेषजम्भिषजा सुते ॥

इन्द्राय। इन्दुम्। सरस्वती। नराशꣳसेन। नग्नहुम्। अधाताम्। अश्विना। मधु। भेषजम्। भिषजा। सुते॥५७॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
(सरस्वती) ज्ञानसम्पन्न विद्वत्-सभा, (इन्द्राय ) दुःख नाशक ऐश्वर्ययुक्त राजपद के लिये ( नराशंसेन) उत्तम पुरुषों द्वारा गुण स्तवन के सहित (नग्नहुम् ) दरिद्रों के पालक, प्रजा के सुखदायक (इन्दुम् ) दयालु, ऐश्वर्यवान् पुरुष को (अधात् ) राज्य पद पर स्थापित करे और ( भिषजा अश्विना) रोगनिवारक वैद्यों के समान विवेकी विद्वान् स्त्री पुरुष ( सुते ) अभिषिक्त राजा या राष्ट्र में ( भेषजम् ) रोग निवारक ओषधि के समान ( मधु ) मधुर अन्न और सेना बल को ( अधातम् ) धारण करें। सेना पोलीस आदि भी शरीर में रोग शम का ओषधि के समान उपद्रवकारी पुरुषों की शान्ति के लिये हों और अन्नादि पदार्थ भूख शान्ति के लिये हों । वह व्यर्थ प्रजा को पीड़ित न करें और व्यसनों में धन नष्ट न करें ।
Subject
सरस्वती और अश्वियों के कर्त्तव्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अनुष्टुप् । गांधारः ॥