Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 26

34 Mantra
2/26
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स्व॒यं॒भूर॑सि॒ श्रेष्ठो॑ र॒श्मिर्व॑र्चो॒दाऽअ॑सि॒ वर्चो॑ मे देहि। सूर्य॑स्या॒वृत॒मन्वाव॑र्ते॥२६॥

स्व॒यं॒भूरिति॑ स्वय॒म्ऽभूः। अ॒सि॒। श्रेष्ठः॑। र॒श्मिः। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। अ॒सि॒। वर्चः॑। मे॒। दे॒हि॒। सूर्य्य॑स्य। आ॒वृत॒मित्या॒ऽवृत॑म्। अनु॑। आ। व॒र्त्ते॒ ॥२६॥

Mantra without Swara
स्वयम्भूरसि श्रेष्ठो रश्मिर्वर्चादाऽअसि वर्चा मे देहि । सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते ॥

स्वयंभूरिति स्वयम्ऽभूः। असि। श्रेष्ठः। रश्मिः। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। असि। वर्चः। मे। देहि। सूर्य्यस्य। आवृतमित्याऽवृतम्। अनु। आ। वर्त्ते॥२६॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! तू ( स्वयंभूः असि ) किसी की अपेक्षा विना किये, स्वतन्त्र समस्त जगत् के उत्पादन, पालन और संहार में स्वयं समर्थ है। तू सब से (श्रेष्ठः) प्रशंसनीय (रश्मिः) परम ज्योति अथवा रश्मि, सब को अपने वश में करने वाला है। तू ( वर्चोदाः असि) सूर्य के समान तेज का देनेहारा है। (मे वर्चः देहि) मुझे तेज प्रदान कर । मैं भी ( सूर्यस्य ) सूर्य के समान सब चराचर जगत् के प्रेरक उत्पादक परमेश्वर के ( आवृतम् ) उपदेश किये आचार या व्रत का ( अनु आवर्त्ते ) पालन करूं। अर्थात् जिस प्रकार सूर्य नियम से दिन रात का सम्पादन करता है और सबको प्रकाश देता और तपता है उसी प्रकार मैं नियम से सोऊं, जागूं, तेजस्वी बनूं, तप करूं । सूर्य के व्रत का पालन करूं ॥ शत० १ । ९ | ३|१६ । १७ ॥
 
Subject
परमेश्वर से तेज और बल की प्रार्थना।
Footenote
२६ --ईश्वरो देवता । द० ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
परमेष्ठी प्राजापत्यः, देवाः प्राजापत्या, प्रजापतिर्वा ऋषिः )
ईश्वरो देवता । उष्णिक् छन्दः । ऋषभः ॥