Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 48

95 Mantra
19/48
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वैखानस ऋषिः Chhand- निचृदष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ॒दꣳ ह॒विः प्र॒जन॑नं मेऽअस्तु॒ दश॑वीर॒ꣳ सर्व॑गण स्व॒स्तये॑। आ॒त्म॒सनि॑ प्रजा॒सनि॑ पशु॒सनि॑ लोक॒सन्य॑भय॒सनि॑। अ॒ग्निः प्र॒जां ब॑हु॒लां मे॑ करो॒त्वन्नं॒ पयो॒ रेतो॑ऽअ॒स्मासु॑ धत्त॥४८॥

इ॒दम्। ह॒विः। प्र॒जन॑न॒मिति॒ प्र॒ऽजन॑नम्। मे॒। अ॒स्तु॒। दश॑वीर॒मिति॒ दश॑ऽवीरम्। सर्व॑ऽगणम्। स्व॒स्तये॑। आ॒त्म॒सनीत्या॑त्म॒ऽसनि॑। प्र॒जा॒सनीति॑ प्रजा॒ऽसनि॑। प॒शु॒सनीति॑ पशु॒ऽसनि॑। लो॒क॒सनीति॑ लोक॒ऽसनि॑। अ॒भ॒य॒सनीत्य॑भय॒ऽ सनि॑। अ॒ग्निः। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। ब॒हु॒लाम्। मे॒। क॒रो॒तु॒। अन्न॑म्। पयः॑। रेतः॑। अ॒स्मासु॑। ध॒त्त॒ ॥४८ ॥

Mantra without Swara
इदँ हविः प्रजननं मे अस्तु दशवीरँ सर्वगणँ स्वस्तये । आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि । अग्निः प्रजाम्बहुलाम्मे करोत्वन्नम्पयो रेतो अस्मासु धत्त ॥

इदम्। हविः। प्रजननमिति प्रऽजननम्। मे। अस्तु। दशवीरमिति दशऽवीरम्। सर्वऽगणम्। स्वस्तये। आत्मसनीत्यात्मऽसनि। प्रजासनीति प्रजाऽसनि। पशुसनीति पशुऽसनि। लोकसनीति लोकऽसनि। अभयसनीत्यभयऽ सनि। अग्निः। प्रजामिति प्रऽजाम्। बहुलाम्। मे। करोतु। अन्नम्। पयः। रेतः। अस्मासु। धत्त॥४८॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( इदम् ) वह (मे) मेरे (हविः) आदान, ग्रहण करने योग्य अन्न, वा दान करने और गर्भ में स्त्री द्वारा स्वीकार करने योग्य ( प्रजननम् ) उत्तम सन्तान उत्पन्न करने वाला वीर्य ( दशवीरम् ) दश पुत्र उत्पन्न करने वाला, अथवा दशों प्राणयुक्त ( सर्वगणम् ) सर्व अंगों में व्यापक, अथवा सब उत्तम गुणों और अंगों से पूर्ण, सर्वाङ्गसुन्दर होकर ( स्वस्तये) कल्याण के लिये हो । वह (आत्मसनि) अपने देह में बल धारण करने वाला, (प्रजासनि) प्रजा देने वाला, (पशुसनि) पशुओं और प्रजागण का बलदाता, (लोकसनि) लोक आत्मा को बल और तेज, देने वाला और (अभयसनि) अभय देने हारा हो । (अभिः) अग्नि के समान तेजस्वी, अग्रणी, पति (मे) मेरी ( बहुलां प्रजाम् ) बहुत सी प्रजाओं को (करोतु ) उत्पन्न करे और हममें ( अन्नम् ) अन्न, ( पयः ) पुष्टिकारक दुग्ध आदि पदार्थ और (रेतः) वीर्य को भी ( धत्त) धारण करावे । शत० १२।८।१।२२॥
राष्ट्र में- 'दशवीर' शरीर में दश प्राणों के समान दश वीर नेताओं से युक्त समस्त प्रजाजन को सुखी कल्याण युक्त करे । वह ( हविः ) कर द्वारा प्राप्त अन्न आदि ऐश्वर्य राजा के स्वतः भोग योग्य और प्रजा, पशु, अन्य लोकों का भी आश्रय देनेवाला या उनको पुष्ट करने वाला हो । 'अग्नि' अग्रणी, वीर नेता सेनापति प्रजाओं की वृद्धि करे और राष्ट्र अन्न ( पयः) दूध आदि पशु सम्पत्ति और (रेतः) वीर्य, बल की वृद्धि करे ।
Subject
देह में सन्तानोत्पादक दश प्राण युक्त वीर्य की प्रार्थना । अग्निस्वरूप पति । राष्ट्रपक्ष में दशवीरनायकों से युक्त सैन्य और नायक का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अग्निर्देवता । निचृदष्टिः । मध्यमः ॥