Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 55

77 Mantra
18/55
Devata- इन्दु र्देवता Rishi- गालव ऋषिः Chhand- आर्षी जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
विश्व॑स्य मू॒र्द्धन्नधि॑ तिष्ठसि श्रि॒तः स॑मु॒द्रे ते॒ हृद॑यम॒प्स्वायुर॒॑पो द॑त्तोद॒धिं भि॑न्त। दि॒वस्प॒र्जन्या॑द॒न्तरि॑क्षात् पृथि॒व्यास्ततो॑ नो॒ वृष्ट्या॑व॥५५॥

विश्व॑स्य। मू॒र्द्धन्। अधि॑। ति॒ष्ठ॒सि॒। श्रि॒तः। स॒मु॒द्रे। ते॒। हृद॑यम्। अ॒प्सु। आयुः॑ अ॒पः। द॒त्त॒। उ॒द॒धिमित्यु॑द॒ऽधिम्। भि॒न्त॒। दि॒वः। प॒र्जन्या॑त्। अ॒न्तरि॑क्षात्। पृ॒थि॒व्याः। ततः॑। नः॒। वृष्ट्या॑। अ॒व॒ ॥५५ ॥

Mantra without Swara
विश्वस्य मूर्धन्नधि तिष्ठसि श्रितः समुद्रे ते हृदयमप्स्वायुरपो दत्तोदधिम्भिन्त्त । दिवस्पर्जन्यादन्तरिक्षात्पृथिव्यास्ततो नो वृष्ट्याव ॥

विश्वस्य। मूर्द्धन्। अधि। तिष्ठसि। श्रितः। समुद्रे। ते। हृदयम्। अप्सु। आयुः अपः। दत्त। उदधिमित्युदऽधिम्। भिन्त। दिवः। पर्जन्यात्। अन्तरिक्षात्। पृथिव्याः। ततः। नः। वृष्ट्या। अव॥५५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे राजन् ! सभापते ! तू ( विश्वस्य मूर्धन् अधि तिष्ठसि ) सूर्य के समान समस्त राष्ट्र के शिर पर से विराजता है । तू ( श्रित: ) समस्त प्रजाओं द्वारा आश्रय किया है । (ते) तेरा ( हृदयम ) हृदय (समुद्रे) अन्तरिक्ष के समान व्यापक सर्वोपकारक परमेश्वर में मग्न हो । ( अप्सु आयुः ) प्रजाओं के उपकार के कार्यों में तेरा जीवन व्यतीत हो । तू (अप: दत्त ) ज्ञानों और उत्तम कर्मों का उपदेश कर । अथवा (अप: दत्त ) राष्ट्र में मेघ के समान कृषि आदि के निमित्त जलों को प्रदान कर और ( उदधिं भिन्त ) जिस प्रकार वायु जल धारण करने वाले मेघ का भेदन करता है उसी प्रकार तु भी जल के धारण करने वाले स्रोतों और नदी प्रवाहों को काट काट कर राष्ट्र में नहरों के रूप में बहा । ( दिवः) सूर्य से या आकाश से ( पर्जन्यात् ) मेघ से, ( अन्तरिक्षात् ) अन्तरिक्षगत वायु से और ( पृथिव्याः ) पृथिवी से तथा ( ततः ) जहां कहीं भी जल हो वहां से प्रजा को जल प्राप्त करा और (नः) हमें ( वृष्ट्या ) मेघ के समान समस्त सुखों की वृष्टि से ( अव ) पालन कर । शत० ९ । ४ । ४ । १२ ॥
Subject
प्रजापालक राजा के मेघ के समान कर्त्तव्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अग्निर्देवता । आर्षी जगती । निषादः ॥