Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 99

98 Mantra
17/99
Devata- यज्ञपुरुषो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- स्वराडार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
धाम॑न्ते॒ विश्वं॒ भुव॑न॒मधि॑ श्रि॒तम॒न्तः स॑मु॒द्रे हृ॒द्यन्तरायु॑षि। अ॒पामनी॑के समि॒थे यऽआभृ॑त॒स्तम॑श्याम॒ मधु॑मन्तं तऽऊ॒र्मिम्॥९९॥

धाम॑न्। ते॒। विश्व॑म्। भुव॑नम्। अधि॑। श्रि॒तम्। अ॒न्तरित्य॒न्तः। स॒मु॒द्रे। हृ॒दि। अ॒न्तरित्य॒न्तः। आयु॑षि। अ॒पाम्। अनी॑के। स॒मि॒थ इति॑ सम्ऽइ॒थे। यः। आभृ॑त॒ इत्याऽभृ॑तः। तम्। अ॒श्या॒म॒। मधु॑मन्त॒मिति॒ मधु॑ऽमन्तम्। ते॒। ऊ॒र्मिम् ॥९९ ॥

Mantra without Swara
धामन्ते विश्वम्भुवनमधिश्रितमन्तः समुद्रे हृद्यन्तरायुषि । अपामनीके समिथे यऽआभृतस्तमश्याम मधुमन्तन्त ऊर्मिम् ॥

धामन्। ते। विश्वम्। भुवनम्। अधि। श्रितम्। अन्तरित्यन्तः। समुद्रे। हृदि। अन्तरित्यन्तः। आयुषि। अपाम्। अनीके। समिथ इति सम्ऽइथे। यः। आभृत इत्याऽभृतः। तम्। अश्याम। मधुमन्तमिति मधुऽमन्तम्। ते। ऊर्मिम्॥९९॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
राजा के पक्ष में- हे राजन् ! ( ते धामनि ) तेरे धारण करने वाले सामर्थ्य के आश्रय पर यह ( विश्वं भुवनम् ) समस्त राष्ट्र ( समुद्रे अन्तः ) जो समुद्र के बीच उससे घिरा है, ( श्रितम् ) आश्रित है। इसी प्रकार ( हृदि ) हृदय में और ( आयुषि अन्तः ) जीवन भर में और ( अपाम् अनीके ) प्रजाओं के सैन्य में और ( समिधे ) संग्राम के अवसर पर ( यः ) जो भी नाना पदार्थ समूह ( आभृत: ) एकत्रित किया जाता है वह ( तम् ) उस ( मधुमन्तम् ) मधुर फल से युक्त, या शत्रु-पीड़नकारी सामर्थ्य से युक्त ( नः ऊर्मिम् ) तेरे उस उर्ध्वगामी सामर्थ्य का ( अश्याम ) हम भोग करें।
परमेश्वर के पक्ष में - हे परमेश्वर ( ते धामनि विश्वं भुवनम् अधिश्वितम् ) तेरे धारण सामर्थ्य के आश्रय पर यह समस्त विश्व आश्रित है । ( समुदे ) समुद्र के ( अन्तः ) बीच में, ( हृदि ) हृदय में ( आयुषि अन्तः ) जीवन में, ( अपाम् अनीके ) ज्ञानों और कर्म्मों के, या आप्त जनों के सत्संग में और ( समिथे ) यज्ञ में ( यः ) जो तेरा ( ऊर्मिः ) उत्कृष्ट रूप ( आहृतः ) प्राप्त है उस ( मधुमन्तम् ) ज्ञानमय मधुर, आल्हादकारी ( उर्मिम् ) रस स्वरूप तरंग को हम ( अश्याम ) प्राप्त करें ।
ईश्वरीय बल की भिन्न २ स्थान में ऊर्मि कैसी २ है ? समुद्र अर्थात् आकाश में सूर्य रूप, हृदय में जाठराग्नि रूप, जीवन में अन्न रूप जलों के संघात में विद्युत् रूप, संग्राम में शौर्य रूप, यज्ञ में अग्नि रूप, यही तेरा तेजोरूप या धाम रूप 'ऊर्मि' है । ( महीधर )
राजा पक्ष में-- राजा का तेज समुद्र में राष्ट्ररूप, हृदय में विजयाभिलाष रूप, आयु में पराक्रमरूप, सैन्य में बलरूप संग्राम में शौर्यरूप है ।