Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 97

98 Mantra
17/97
Devata- यज्ञपुरुषो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क॒न्याऽइव वह॒तुमेत॒वा उ॑ऽअ॒ञ्ज्यञ्जा॒नाऽअ॒भि चा॑कशीमि। यत्र॒ सोमः॑ सू॒यते॒ यत्र॑ य॒ज्ञो घृ॒तस्य॒ धारा॑ऽअ॒भि तत्प॑वन्ते॥९७॥

क॒न्या᳖ऽइ॒वेति॑ क॒न्याः᳖ऽइव। व॒ह॒तुम्। एत॒वै। ऊँ॒ऽइत्यूँ॑। अ॒ञ्जि। अ॒ञ्जा॒नाः। अ॒भि। चा॒क॒शी॒मि॒। यत्र॑। सोमः॑। सू॒यते॑। यत्र॑। य॒ज्ञः। घृ॒तस्य॑। धाराः॑। अ॒भि। तत्। प॒व॒न्ते॒ ॥९७ ॥

Mantra without Swara
कन्याऽइव वहतुमेतवाऽउऽअञ्ज्यञ्जानाऽअभि चाकशीमि । यत्र सोमः सूयते यत्र यज्ञो घृतस्य धाराऽअभि तत्पवन्ते॥

कन्याऽइवेति कन्याःऽइव। वहतुम्। एतवै। ऊँऽइत्यूँ। अञ्जि। अञ्जानाः। अभि। चाकशीमि। यत्र। सोमः। सूयते। यत्र। यज्ञः। घृतस्य। धाराः। अभि। तत्। पवन्ते॥९७॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( यत्र ) जहाँ ( सोमः सूयते ) सोम का सवन होता है और ( यत्र ) जहां ( यज्ञः ) यज्ञ होता है ( तत् ) वहां ( घृतस्य धारा ) घृत का धाराएं ( पवन्ते ) बहती हैं। इसी प्रकार (यत्र ) जहां ( सोमः ) राष्ट्र प्रेरक राजा का सवन अर्थात् अभिषेक होता है और ( यत्र ) जहां ( यज्ञः ) परस्पर संगति, व्यवस्था से युक्त राजा प्रजा का पालन रूप यज्ञ या करादान और ऐश्वर्यदान रूप यज्ञ होता है। वहां ( घृतस्य ) वीर्य या बल को धारण करने वाली सेनाएं या अधिकार वाली राज्य व्यवस्थाएं, नियम धाराएं ( पवन्ते ) प्रकट होती हैं। मैं घृत की धारा और बल धारक सेनाओं को, ( वहतुम् ) विवाह योग्य पति के प्रति ( एतवै ) आने के लिये उत्सुक ( अञ्जि ) अपने कमनीय स्वरूप सौभाग्य या पूर्ण यौवन के प्रकट करने वाले सुरूप को ( अज्जाना: ) प्रकट करती हुई ( कन्याः इव ) कन्याओं के समान अति उत्सुक ( अभिचाकशीमि ) देखता हूं ।
Subject
उनकी कन्याओं से तुलना ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋष्यादि पूर्ववत ॥