Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 9

98 Mantra
17/9
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स नः॑ पावक दीदि॒वोऽग्ने दे॒वाँ२ऽइ॒हा व॑ह। उप॑ य॒ज्ञꣳ ह॒विश्च॑ नः॥९॥

सः नः॒। पा॒व॒क॒। दी॒दि॒व इति॑ दीदि॒ऽवः। अग्ने॑। दे॒वान्। इ॒ह। आ। व॒ह॒। उप॑। य॒ज्ञम्। ह॒विः। च॒। नः॒ ॥९ ॥

Mantra without Swara
स नः पावक दीदिवो ग्ने देवाँ इहाऽवह । उप यज्ञँ हविश्च नः ॥

सः नः। पावक। दीदिव इति दीदिऽवः। अग्ने। देवान्। इह। आ। वह। उप। यज्ञम्। हविः। च। नः॥९॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे ( पावक ) पवित्रकारक कण्टकशोधक ! हे ( अग्ने ) अग्रणी नायक ! एवं अग्नि के समान तेजस्विन् ! हे ( दीदिवि: ) शत्रुदाहक ! अग्नि के समान जाज्वल्यमान ! ( सः ) वह तू ही ( नः ) हमारे हित के लिये ( देवान् ) विद्वान् पुरुषों को ( इह ) इस राष्ट्र में ( आ वह ) प्राप्त करा, लाकर बसा और ( नः यज्ञं ) हमारे यज्ञरूप परस्पर की
संगति से बने राष्ट्र को ( उप वह ) अपने ऊपर ले और ( नः हविः च उपवह ) और हमें अन्न भी प्राप्त करा । शत० ९ । १ । २ । ३० ।।
Subject
राष्ट्र का धारण ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अग्निर्देवता । निचृदार्षी गायत्री । षड्जः ॥