Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 85

98 Mantra
17/85
Devata- चातुर्मास्या मरुतो देवता Rishi- सप्तऋषय ऋषयः Chhand- स्वराडार्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स्वत॑वाँश्च प्रघा॒सी च॑ सान्तप॒नश्च॑ गृहमे॒धी च॑। क्री॒डी च॑ शा॒की चो॑ज्जे॒षी॥८५॥

स्वत॑वा॒निति॒ स्वऽत॑वान्। च॒। प्र॒घा॒सीति॑ प्रऽघा॒सी। च॒। सा॒न्त॒प॒न इति॑ साम्ऽतप॒नः। च॒। गृ॒ह॒मे॒धीति॑ गृ॒ह॒मे॒धी। च॒। क्री॒डी। च॒। शा॒की। च॒। उ॒ज्जे॒षीत्यु॑त्ऽजे॒षी ॥८५ ॥

Mantra without Swara
स्वतवाँश्च प्रघासी च सान्तपनश्च गृहमेधी च । क्रीडी च शाकी चोज्जेषी ॥

स्वतवानिति स्वऽतवान्। च। प्रघासीति प्रऽघासी। च। सान्तपन इति साम्ऽतपनः। च। गृहमेधीति गृहमेधी। च। क्रीडी। च। शाकी। च। उज्जेषीत्युत्ऽजेषी॥८५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
और इसी प्रकार ( स्वतवान् ) स्वयं बलशाली, ( प्रघासीच ) उत्कृष्ट पदार्थ को भोजन करने वाला, ( सांतपनः च ) उत्तम रूप से तप करने वाला या प्रजा के धर्म कर्म संस्कार करनेहारा, ( गृहमेधी च ) गृहस्थ, ( क्रीडी च ) क्रीड़ाशील, युद्धविजयी, ( शाकी ) शक्तिमान्, ( उज्जेषी च ) और उत्तम पदों का जय करने हारा ये लोग भी प्रजा के मुख्य अंग है ।
Subject
प्रजा के सात मुख्य अंग ।
Footenote
इतः परं क्वचित पुस्तकेषु अयं मन्त्रः पठ्यते ।
अर्थ - ( उग्रः ) बलवान् ( भीम: ) भयानक ( ध्वान्तः ) अन्धकार के समान शत्रुओं को अन्धकार करनेहारा, ( धुविः च ) कंपा देने वाला, ( सामहवान् ) पराजित करने वाला, ( अभियुग्वा ) आक्रमण करनेवाला और ( विक्षिपः ) विविध दिशाओं से शत्रु पर शस्त्र फेंकने वाला। ये भी विजय कार्य के निमित्त वीर नेता पुरुष आवश्यक हैं। इस प्रकार ये मरुद्गण ४९ गिने जाते हैं ।