Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 59

98 Mantra
17/59
Devata- आदित्यो देवता Rishi- विश्वावसुर्ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि॒मान॑ऽए॒ष दि॒वो मध्य॑ऽआस्तऽआपप्रि॒वान् रोद॑सीऽअ॒न्तरि॑क्षम्। स वि॒श्वाची॑र॒भिच॑ष्टे घृ॒तीची॑रन्त॒रा पूर्व॒मप॑रं च के॒तुम्॥५९॥

वि॒मान॒ इति॑ वि॒ऽमानः॑। ए॒षः। दि॒वः। मध्ये॑। आ॒स्ते॒। आ॒प॒प्रि॒वानित्या॑ऽपप्रि॒वान्। रोद॑सी॒ इति॒ रोद॑सी। अ॒न्तरि॑क्षम्। सः। वि॒श्वाचीः॑। अ॒भि। च॒ष्टे॒। घृ॒ताचीः॑। अ॒न्त॒रा। पूर्व॑म्। अप॑रम्। च॒। के॒तुम् ॥५९ ॥

Mantra without Swara
विमानऽएष दिवो मध्यऽआस्तऽआपप्रिवान्रोदसीऽअन्तरिक्षम् । स विश्वाचीरभि चष्टे घृताचीरन्तरा पूर्वमपरं च केतुम् ॥

विमान इति विऽमानः। एषः। दिवः। मध्ये। आस्ते। आपप्रिवानित्याऽपप्रिवान्। रोदसी इति रोदसी। अन्तरिक्षम्। सः। विश्वाचीः। अभि। चष्टे। घृताचीः। अन्तरा। पूर्वम्। अपरम्। च। केतुम्॥५९॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
सूर्य के पक्ष में- ( एष ) यह सूर्य ( विमानः पक्षी के समान या विमान, व्योमयान के समान (दिवः मध्ये ) आकाश के बीच ( आस्ते ) स्थित है। वह ( रोदसी अन्तरिक्षम् ) द्यौ और पृथिवी और अन्तरिक्ष तीनों को ( आ पप्रिवान् ) अपने तेज से पूर्ण करता है । ( सः ) वह ( विश्वाची:) समस्त विश्व को अपने में रखने वाला और ( घृताची: ) जल को धारण करने वाला, भूमियों को, प्रजाओं को और दिशाओं को ( अभिचष्टे देखता है और (पूर्वम् अपरं च केतुम् अन्तरा) पूर्व के और पश्चिम के ज्ञापक लिंग को भी देखता है। ऋ०१०।१३९ । २ ।। शत०९।२।३।१७॥
अथवा (सः) वह ( विश्वाची घृताचीः ) सर्वत्र फैलने वाली, जलाहरण करने वाली कान्तियों को और ( पूर्वम् अपरं च ) पूर्व दिन और अपर रात्रि दोनों के बीच के काल को भी ( अभिष्ट ) प्रकाशित करता है ।
राजा के पक्ष में - ( एष: ) महाराजा ( दिवः मध्ये ) तेज और प्रकाश के बीच या ज्ञानी पुरुषों के बीच में (विमानः ) विशेष मान, आदरवान् होकर ( अस्ते ) विराजता है वह ( रोदसी ) शासक और प्रजा दोनों को और ( अन्तरिक्ष | सबके रक्षक सर्व पूज्य अन्तरिक्ष पद को भी पूर्ण करता है यह विश्व को धारण करने वाली ( घृताची ) अन्न जल की धारक भूमियों और प्रजाओं को ( पूर्वम् अपरं च केतुम् ) पूर्व के और पश्चिम के ज्ञापक ध्वजादि को भी ( अभिचष्टे ) सूर्य के समान देखता है ।
इसी प्रकार आदित्य योगी विशेष ज्ञानवान होने से 'विमान' है । वह प्रकाश स्वरूप परमेश्वर के बीच ब्रह्मस्थ होकर विराजता है । वह प्राण अपान और अन्तरिक्ष, हृदयाकाश सब को पूर्ण करता है । वह देह में व्याप्त और तेजोव्याप्त नाड़ियों को और पूर्व और अपर केतु अर्थात् जीव और ब्रह्म दोनों के ज्ञानमय स्वरूप को साक्षात् करता है ।
Subject
सूर्य और पक्षान्तर में राजा का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
विश्वावसु ऋषिः । आदित्यो देवता । आर्षी त्रिष्टुप् । धैवतः ॥