Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 45

98 Mantra
17/45
Devata- इषुर्देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- आर्ष्यनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अव॑सृष्टा॒ परा॑ पत॒ शर॑व्ये॒ ब्रह्म॑सꣳशिते। गच्छा॒मित्रा॒न् प्र प॑द्यस्व॒ मामीषां॒ कञ्च॒नोच्छि॑षः॥४५॥

अव॑सृ॒ष्टेत्यव॑ऽसृष्टा। परा॑। प॒त॒। शर॑व्ये। ब्रह्म॑सꣳशित॒ इति॒ ब्रह्म॑ऽसꣳशिते। गच्छ॑। अ॒मित्रा॑न्। प्र। प॒द्य॒स्व॒। मा। अ॒मीषा॑म्। कम्। च॒न। उत्। शि॒षः॒ ॥४५ ॥

Mantra without Swara
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसँशिते । गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषाङ्कं चनोच्छिषः ॥

अवसृष्टेत्यवऽसृष्टा। परा। पत। शरव्ये। ब्रह्मसꣳशित इति ब्रह्मऽसꣳशिते। गच्छ। अमित्रान्। प्र। पद्यस्व। मा। अमीषाम्। कम्। चन। उत्। शिषः॥४५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे ( शरव्ये ) हिंसक या प्राणघातक साधनों की बनी हुई शरव्ये ! शर वर्षाने वाली कले! हे ( ब्रह्मसंशिते ) बड़े भारी बल वीर्य से अति तीक्ष्ण, वेग वाली की गयी तू ( अवसृष्टा ) छोड़ी या चलाई जा कर ( परापत ) दूर तक जा और ( गच्छ ) इधर भी जा और ( अमित्रान् ) शत्रुओं तक ( प्र पद्यस्व) आगे बढ़ी चली जा और उनतक पहुंच । ( अमीषां ) उन शत्रुओं में से ( कञ्चन ) किसी को भी ( मा उत् शिषः ) जीता बचा न छोड़ ।
अनेक बाणों या गोलियों को एकही साथ छोड़ने वाली तोप के समान कोई कला 'शरव्या' कहाती प्रतीत होती है । शरमयी इषुः शख्य इति उव्वटः। 'शरमयी हेतिः शरव्या' इति महीधरः । 'इषु' या हेति' जो किसी साधन को दूर फेंके वह कला 'इषु' या 'हेति' कहाती है ।
अथवा - हे ( ब्रह्मसंशिते शरव्ये ) विद्वानों से प्रशंसित बाणविद्या की विदुषि स्त्रि ! तू प्रेरित होकर जा, शत्रुओं को मार, उनमें से किसी को न छोड़ ॥
Subject
भयंकर सेना का शत्रु पीड़न का कार्य ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
४५-४६ अप्रतिरथ ऋषिः । प्रजापतिः विवस्वान्वेत्येके । इषुर्देवता ।
आर्ष्यनुष्टुप् । गांधारः ॥