Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 30

98 Mantra
17/30
Devata- विश्वकर्मा देवता Rishi- भुवनपुत्रो विश्वकर्मा ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तमिद् गर्भं॑ प्रथ॒मं द॑ध्र॒ऽआपो॒ यत्र॑ दे॒वाः स॒मग॑च्छन्त॒ विश्वे॑। अ॒जस्य॒ नाभा॒वध्येक॒मर्पि॑तं॒ यस्मि॒न् विश्वा॑नि॒ भुव॑नानि त॒स्थुः॥३०॥

तम्। इत्। गर्भ॑म्। प्र॒थ॒मम्। द॒ध्रे॒। आपः॑। यत्र॑। दे॒वाः। स॒मग॑च्छ॒न्तेति॑ सम्ऽअग॑च्छन्त। विश्वे॑। अ॒जस्य॑। नाभौ॑। अधि॑। एक॑म्। अर्पि॑तम्। यस्मि॑न्। विश्वा॑नि। भुव॑नानि। त॒स्थुः ॥३० ॥

Mantra without Swara
तमिद्गर्भम्प्रथमन्दध्रऽआपो यत्र देवाः समगच्छन्त विश्वे । अजस्य नाभावध्येकमर्पितँयस्मिन्विश्वानि भुवनानि तस्थुः ॥

तम्। इत्। गर्भम्। प्रथमम्। दध्रे। आपः। यत्र। देवाः। समगच्छन्तेति सम्ऽअगच्छन्त। विश्वे। अजस्य। नाभौ। अधि। एकम्। अर्पितम्। यस्मिन्। विश्वानि। भुवनानि। तस्थुः॥३०॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
पूर्व प्रश्न का उत्तर । राजा के पक्ष में - ( तम् ) उस ( प्रथमम् ) सर्वश्रेष्ठ ( गर्भम् ) राष्ट्र को ग्रहण करने में समर्थ या प्रजा द्वारा राजा स्वीकार करने और आश्रय रूप से ग्रहण करने योग्य पुरुष को ( आप: ) आप्त प्रजाएं ( दध्रे ) धारण करती हैं ( यत्र ) जिसका आश्रय लेकर ( देवाः ) समस्त विद्वान् गण और शासक ( सम् अगच्छन्त ) एकत्र होते और व्यवस्था में संगठित हो जाते हैं । ( अजस्य ) अनुत्पन्न, अप्रकट रूप में विद्यमान राज्य के ( नाभौ ) नाभि, या केन्द्र भाग में ( अधि ) सबके ऊपर अधिष्ठाता रूप से ( एकम् ) उस एक पद को ( अर्पितम् ) स्थापित किया जाता है ( यस्मिन् ) जिस पर आश्रित होकर ( विश्वानि भुवनानि ) समस्त चर अचर प्राणि और प्रजाएं ( तस्थुः ) राष्ट्र में स्थिर होकर रहते हैं ।
परमेश्वर के पक्ष में- ( तम् इत् प्रथमम् ) उसही सर्वश्रेष्ठ सबसे प्रथम विद्यमान परमेश्वर के ( आपः ) प्रकृति के कारण परमाणु अपने ( गर्भम् दध्रे ) गर्भ में धारण करते हैं ( यत्र ) जिसके आश्रित ( विश्वे देवा: सम् अगच्छन्त ) समस्त दिव्य शक्तियां, पांचो भूत आदि वैकारिक पदार्थ एकत्र होकर एक काल में व्यवस्थित हैं । वस्तुतः ( अजस्य ) अव्यक्त रूप से विद्यमान संसार के ( नाभौ ) नाभि, केन्द्र अथवा उसको बांधने वाले तत्व के रूप में ( एकम् ) एक परम तत्व ( अधि अर्पितम् ) सर्वोपरि विद्यमान है ( यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थुः ) जिसमें समस्त भुवन, उत्पन्न लोक आश्रय पाकर स्थिर हैं।
Subject
सर्व वशकर्त्ता केन्द्रस्थ राजा का वर्णन ।पक्षान्तर में परमेश्वर का वर्णन ।