Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 25

98 Mantra
17/25
Devata- विश्वकर्मा देवता Rishi- भुवनपुत्रो विश्वकर्मा ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
चक्षु॑षः पि॒ता मन॑सा॒ हि धीरो॑ घृ॒तमे॑नेऽअजन॒न्नम्न॑माने। य॒देदन्ता॒ऽअद॑दृहन्त॒ पूर्व॒ऽआदिद् द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॑प्रथेताम्॥२५॥

चक्षु॑षः। पि॒ता। मन॑सा। हि। धीरः॑। घृ॒तम्। ए॒न॒ऽइत्ये॑ने। अ॒ज॒न॒त्। नम्न॑माने॒ऽइति॒ नम्न॑माने। य॒दा। इत्। अन्ताः॑। अद॑दृहन्त। पूर्वें॑। आत्। इत्। द्यावा॑पृथि॒वी। अ॒प्र॒थे॒ता॒म् ॥२५ ॥

Mantra without Swara
चक्षुषः पिता मनसा हि धीरो घृतमेनेऽअजनन्नम्नमाने । यदेदन्ताऽअददृहन्त पूर्वऽआदिद्द्यावापृथिवीऽअप्रथेताम् ॥

चक्षुषः। पिता। मनसा। हि। धीरः। घृतम्। एनऽइत्येने। अजनत्। नम्नमानेऽइति नम्नमाने। यदा। इत्। अन्ताः। अददृहन्त। पूर्वें। आत्। इत्। द्यावापृथिवी। अप्रथेताम्॥२५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
राजा के पक्ष में - ( यदा इत् ) जब ही ( पूर्वे ) पूर्व के विद्वान् लोग ( अन्ता ) सीमा भागों को ( अदृहन्त ) विस्तृत करके स्थिर कर लेते हैं। ( आत् इत् ) उसके बाद ही ( द्यावापृथिवी ) सूर्य पृथिवी के समान एक दूसरे के उपकारक राजा और प्रजा भी दोनों ( अप्रथेताम् ) विस्तार को प्राप्त होते हैं । और ( चक्षुषः पिता ) सब प्रजा पर निरीक्षण करने वाले राजा का ( पिता ) पालक, विद्वान् पुरोहित ही ( धीरः ) बुद्धिमान् होकर ( मनसा ) अपने ज्ञान से ( घृतम् ) तेज और ज्ञान-बल को (अजनत् ) उत्पन्न या प्रकट करता है और ( एने ) इन दोनों को ( नम्नमाने ) एक दूसरे के प्रति आदर से झुकने वाले विनयशील बनाता है। विद्वान् लोग ही राजा प्रजा को परस्पर मिलाते हैं और दोनों को एक दूसरे के प्रति विनीत बनाते और वे ही राज्य की सीमाओं को और व्यवस्थाओं को बनाते हैं ।
ईश्वर के पक्ष में -- ( यदा इत् ) जबही ( अन्ता ) सीमाएं अर्थात् प्रकृति के विरल परमाणु ( अददृहन्त ) कुछ घनी भूत होकर दृढ़ हो गये तो ( आत् इत् ) तभी ( द्यावापृथिवी अप्रथेताम् ) आकाश और भूमि दोनों पृथक् २ हो गये। बीच का अवकाश प्रकट हो गया । ( धीरः ) जगत् को धारण करने हारे ( मनसा ) अपने मन, संपल्प के बल से ही (नम्नमाने एने ) एक दूसरे के प्रति झुकने वाले इन दोनों के प्रति ( घृतम् अजनत् ) जल को प्रकट किया अर्थात् पृथ्वी से जल ही ऊपर को सूक्ष्म होकर उठता है । सूर्य से किरण पृथिवी पर पड़ती हैं । पुनः भूमि उत्तम होती है। फिर जल ही आकाश से नीचे आता है अर्थात् दोनों को परस्पर सम्बन्ध विधायक जल ही है ।
स्त्री पुरुष के पक्ष में- जब विद्वान् लोग दोनों स्त्री पुरुषों के ( अन्ता ) विवाह द्वारा अंचरे बांध देते हैं तभी वे ( द्यावापृथिवी अप्रथेतानम् ) नरनारी सूर्य और पृथिवी के से सम्बन्ध से मिले दीखते हैं। पुरुष सूर्य के समान तेजस्वी, तेज रूप वीर्य का प्रक्षेपक होता है और पृथिवी स्त्री बीज को भीतर धारण करने हारी होती है । तब ( चक्षुषः पिता ) आंख का पालक, स्नेहमय चक्षु का पालक, प्राण ( एने नम्नमाने प्रति ) इनको एक दूसरे के प्रति झुकते हुए या परस्पर संगत होते हुए इनके बीच में ( घृतम् ) स्नेह या 'तेज', वीर्य को ( अजनत् ) उत्पन्न कर देता है ।
Subject
विद्वान राजा का रजवर्ग और प्रजावर्ग दोनों का शासन करना । पक्षान्तर में परमेश्वर का वर्णन और पक्षान्तर में विद्वान् को स्त्री पुरुष को सम्बन्धित करना ।