Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 7

66 Mantra
16/7
Devata- रुद्रो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- विराडार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒सौ योऽव॒सर्प॑ति॒ नील॑ग्रीवो॒ विलो॑हितः। उ॒तैनं॑ गो॒पाऽअ॑दृश्र॒न्नदृ॑श्रन्नुदहा॒र्य्यः स दृ॒ष्टो मृ॑डयाति नः॥७॥

अ॒सौ। यः। अ॒व॒सर्प्प॒तीत्य॑व॒ऽसर्प्प॒ति। नील॑ग्रीव॒ इति॒ नील॑ऽग्रीवः। विलो॑हित॒ इति॒ विऽलो॑हितः। उ॒त। ए॒न॒म्। गो॒पाः। अ॒दृ॒श्र॒न्। अदृ॑श्रन्। उ॒द॒हा॒र्य्य᳕ इत्यु॑दऽहा॒र्य्यः᳕। सः। दृ॒ष्टः। मृ॒ड॒या॒ति॒। नः॒ ॥७ ॥

Mantra without Swara
असौ योवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः । उतैनङ्गोपाऽअदृश्रन्नदृश्रन्नुदहार्यः स दृष्तो मृडयाति नः ॥

असौ। यः। अवसर्प्पतीत्यवऽसर्प्पति। नीलग्रीव इति नीलऽग्रीवः। विलोहित इति विऽलोहितः। उत। एनम्। गोपाः। अदृश्रन्। अदृश्रन्। उदहार्य्य इत्युदऽहार्य्यः। सः। दृष्टः। मृडयाति। नः॥७॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( यः ) जो ( असौ ) वह ( नीलग्रीवः) गले में नीलमणि बाँधे और ( विलोहितः ) विष रूप से लाल पोशाक पहने अथवा विविधा गुणों और अधिकारों से उच्च पद को प्राप्त कर ( अवसर्पति ) निरन्तर आगे बढ़ा चला जाता है ( एन ) उसको तो ( गोपाः ) गौवों के पालक गोपाल और ( उदहार्यः ) जल लाने वाली कहारियों तक भी ( अदृश्रन् ) देख लेती हैं और पहचानती हैं । सः ) वे ( दृष्टः ) आखों से देखा जाकर ( नः मृडयाति ) हम प्रजाजनों को सुखी करें ।
( ६,७ ) - अध्यात्म में समाधि के अवसर के पूर्व ताम्र, अरुण, बभ्रु, नील, व रक्त आदि वर्णों का साक्षात् होता है। उस आत्मा के ही आधार पर ( रुदा ) रोदन शील सहस्रों प्राणि अश्रित हैं। हम उनका अनादर न करें। क्योंकि उनमें वही चेतनांश हैं जो हम में हैं । उसी अत्मा को नीलमणि के समान, स्वच्छ कान्तिमान् अथवा लालमणि के समान विशुद्ध रोहित से( गोपाः )जो इन्द्रिय-विजयी अभ्यासी जन और ( उदहार्यः) ब्रह्ममृत् रस को स्वादन करनेवाली चित्त भूमियें साक्षात् करती हैं वह हमें सुखी करें।
ईश्वर-पक्ष में वह पापियों को पीड़ित करने से 'ताम्र', शरण देने से 'ग्रहण', पालन पोषण करने से 'बभ्रु, सुखमय रूप से व्यापक होने से 'सुमङ्गल' है । समस्त ( रुदाः) बढ़ी शक्तियां, उसी पर आश्रित हैं । हम उनका अनादर न करें। वह प्रलयकाल में या भूतकाल में जगत् को लीन करने वाला होने से 'नीलग्रीव' है, भविष्य में विविध पदार्थों का निरन्तर उत्पादक होने से 'विलोहित' है । उसको सयंमी जन और ब्रह्मरसपायिनी ऋतंभरा आदि चित्त वृत्तियां साक्षात् करती हैं। वह ईश्वर हमें सुखी करें ।
नीलग्रीवाः = नीलास्याः - यथा चूलिकोपनिषदि नीलास्याः ब्रह्म शायिने । अत्र दीपिका - लीनमास्यम् मुखं प्रवृत्ति द्वारं रांगादि येषां तथोक्ता । तत्र नलयो वर्णविपर्ययश्छान्दसः
यस्मिन् सर्वमिदं प्रोतं ब्रह्म स्थावरजंगमम् ।
तस्मिन्नेव लयं यान्ति बुदबुदाः सागरे यथा ॥ १७ ॥ चू० ॥आ० ॥
Subject
सेनापति का स्वरूप । पक्षान्तर में आत्मा और ईश्वर का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
विराड् आर्षी पंक्ति: । पञ्चमः ॥