Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 44

65 Mantra
15/44
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- आर्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्ने॒ तम॒द्याश्वं॒ न स्तोमैः॒ क्रतुं॒ न भ॒द्रꣳ हृ॑दि॒स्पृश॑म्। ऋ॒ध्यामा॑ त॒ऽओहैः॑॥४४॥

अग्ने॑। तम्। अ॒द्य। अश्व॑म्। न। स्तोमैः॑। क्रतु॑म्। न। भ॒द्रम्। हृ॒दि॒स्पृश॒मिति॑ हृदि॒ऽस्पृश॑म्। ऋ॒ध्याम॑। ते॒ ओहैः॑ ॥४४ ॥

Mantra without Swara
अग्ने तमद्याश्वन्न स्तोमैः क्रतुं न भद्रँ हृदिस्पृशम् । ऋध्यामा तऽओहैः ॥

अग्ने। तम्। अद्य। अश्वम्। न। स्तोमैः। क्रतुम्। न। भद्रम्। हृदिस्पृशमिति हृदिऽस्पृशम्। ऋध्याम। ते ओहैः॥४४॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे ( अग्ने ) अग्रणी नेत: ! ( अश्वं न ) जिस प्रकार वेगवान् अश्व को शीघ्रता से पहुंचा देने के कारण उत्तम साधुवादों और अन्नों से समृद्ध करते हैं और ( स्तोमैः क्रतुं न ) जिस प्रकार स्तुति समूहों और वेद मन्त्रों से यज्ञ कर्म को समृद्ध करते हैं। उसी प्रकार ( भद्रं ) कल्याणकारी ( हृदिस्पृशम् ) हृदय में स्पर्श करने वाले अतिप्रिय ( तम् ) उस परम उपकारी तुझ को भी ( ते ) तेरे योग्य ( ओहैः ) नाना पुरस्कार योग्य पदार्थों से ( ऋध्याम ) समृद्ध करें।
Subject
यज्ञ रूप, प्रजापति।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अग्निर्देवता । आर्षी गायत्री । षड्जः ॥