Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 40

65 Mantra
15/40
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
येना॑ स॒मत्सु॑ सा॒सहोऽव॑ स्थि॒रा त॑नुहि॒ भूरि॒ शर्ध॑ताम्। व॒नेमा॑ तेऽअ॒भिष्टि॑भिः॥४०॥

येन॑। स॒मत्स्विति॑ स॒मत्ऽसु॑। सा॒सहः॑। स॒सह॒ इति॑ स॒सहः॑। अव॑। स्थि॒रा। त॒नु॒हि॒। भूरि॑। शर्ध॑ताम्। व॒नेम॑। ते॒। अ॒भिष्टि॑भि॒रित्य॒भिष्टि॑ऽभिः ॥४० ॥

Mantra without Swara
येना समत्सु सासहो व स्थिरा तनुहि भूरि शर्धताम् । वनेमा तेऽअभिष्टिभिः ॥

येन। समत्स्विति समत्ऽसु। सासहः। ससह इति ससहः। अव। स्थिरा। तनुहि। भूरि। शर्धताम्। वनेम। ते। अभिष्टिभिरित्यभिष्टिऽभिः॥४०॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( येन ) क्योंकि ( समत्सु ) संग्रमों में तू ( सासहः ) शत्रुओं की पराजय करने में समर्थ रहे। अतः तू ( शर्धताम् ) बल पराक्रमशील
पुरुषों के ( स्थिरा ) स्थिर सेन्यों को ( अवतनुहि ) अपने अधीन विस्तृत रूप से रख। और हम (ते) तेरे ( अभिष्टिभिः ) अभीष्ट कामनाओं और अभिलाषाओं के सहित ( ते ) तेरे अधीन ( वनेम ) ऐश्वर्य का भोग करें ।
Subject
संग्राम में विजयी होने का उपदेश ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अग्निर्देवता । निचृदुष्णिक् । ऋषभः ॥