Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 24

65 Mantra
15/24
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- निचृत त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अबो॑ध्य॒ग्निः स॒मिधा॒ जना॑नां॒ प्रति॑ धे॒नुमिवाय॒तीमु॒षास॑म्। य॒ह्वाऽइ॑व॒ प्र व॒यामु॒ज्जिहा॑नाः॒ प्र भा॒नवः॑ सिस्रते॒ नाक॒मच्छ॑॥२४॥

अबो॑धि। अ॒ग्निः। स॒मिधेति॑ स॒म्ऽइधा॑। जना॑नाम्। प्रति॑। धे॒नुमि॒वेति॑ धे॒नुम्ऽइ॑व। आ॒य॒तीमित्या॑ऽय॒तीम्। उ॒षास॑म्। उ॒षस॒मित्यु॒षस॑म्। य॒ह्वा इ॒वेति॑ य॒ह्वाःऽइ॑व। प्र। व॒याम्। उ॒ज्जिहा॑ना॒ इत्यु॒त्ऽजिहा॑नाः। प्र। भा॒नवः॑। सि॒स्र॒ते॒। नाक॑म्। अच्छ॑ ॥२४ ॥

Mantra without Swara
अबोध्यग्निः समिधा जनानाम्प्रति धेनुमिवायतीमुषासम् । यह्वाऽइव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सिस्रते नाकमच्छ ॥

अबोधि। अग्निः। समिधेति सम्ऽइधा। जनानाम्। प्रति। धेनुमिवेति धेनुम्ऽइव। आयतीमित्याऽयतीम्। उषासम्। उषसमित्युषसम्। यह्वा इवेति यह्वाःऽइव। प्र। वयाम्। उज्जिहाना इत्युत्ऽजिहानाः। प्र। भानवः। सिस्रते। नाकम्। अच्छ॥२४॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
( धेनुम् इव ) दुधार कपिला गाय के समान (आयलीम् ) आनेवाली (प्रति उषासम् ) प्रत्येक प्रातः काल को ( राजा के पक्ष में (जनानां समिधा ) जनों, प्रजाओं के उपकार के लिये ( समिधा ) समिधा से ( अग्निः अबोधि ) जिस प्रकार होमाग्नि प्रदीप्त होता है और जिस प्रकार ( जनानां ) मनुष्यों के उपकार के लिये ( समिधा ) तेज से ( प्रतिउषासम् ) प्रति प्रातःकाल ( अग्निः अबोधि ) सूर्य प्रकाशित होता है उसी प्रकार ( जनानां ) राष्ट्र के प्रजाजनों के ( सम्-इधा ) सूर्य के समान तेज से ही ( धेनुम् इव ) कपिला गाय के समान ( आयतीम् ) प्राप्त होने वाला ( प्रति उषासम् ) प्रत्येक दुष्टों के संताप देने के अवसर (अग्निः ) अग्नि के समान तेजस्वी अग्रणी नेता रूप परंतप राजा को ( अबोधि ) प्रज्वलित, उत्तेजित किया जाता है। ( उज्जिहानां यह्नाः ) ऊपर उड़ने वाले बड़े २ पक्षी जिस प्रकार ( वयाम् प्रसिस्रते ) शाखा की और आश्रय लेने के लिये बढ़ते हैं। और ( भानवः ) सूर्य की उज्ज्वल किरणें ( नाकम् प्रसिस्रते ) जिस प्रकार आकाश की ओर बढ़ती हैं । उसी प्रकार ( यहां ) बड़े २ पदाधिकारी लोग ( वयाम् ) व्यापक उदार नीति को या कीर्ति को प्राप्त करते हैं और ( भानव: ) तेजस्वी पुरुष लोग ( नाकम् ) सुखमय राष्ट्र को ( अच्छ ) भली प्रकार प्राप्त करते हैं।
अध्यात्म में देखो सामवेद द्वितीय संस्क० मन्त्र सं० ७३ ॥ और अभर्व० १३ । २ । ४६ ॥
Subject
वन्दनीय परमेश्वर और स्तुत्य राजा का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
बुधगविष्ठिरौ ऋषी । अग्निर्देवता । निचृत् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥