Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 14 / Mantra 22

31 Mantra
14/22
Devata- विदुषी देवता Rishi- विश्वदेव ऋषिः Chhand- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यन्त्री॒ राड् य॒न्त्र्यसि॒ यम॑नी ध्रु॒वासि॒ धरि॑त्री। इ॒षे त्वो॒र्जे त्वा॑ र॒य्यै त्वा॒ पोषा॑य त्वा॥२२॥

यन्त्री॑। राट्। य॒न्त्री। अ॒सि॒। यम॑नी। ध्रु॒वा। अ॒सि॒। धरि॑त्री। इ॒षे। त्वा॒। ऊ॒र्ज्जे। त्वा॒। र॒य्यै। त्वा॒। पोषा॑य। त्वा॒ ॥२२ ॥

Mantra without Swara
यन्त्री राड्यन्त्र्यसि यमनी धु्रवासि धरित्री । इषे त्वोर्जे त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा लोकन्ताऽइन्द्रम्॥ गलितमन्त्रा----- लोकम्पृण च्छिद्रम्पृणाथो सीद धु्रवा त्वम् । इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पतिरस्मिन्योनावसीषदन् ॥ ताऽअस्य सूददोहसः सोमँ श्रीणन्ति पृश्नयः । जन्मन्देवानाँविशस्त्रिष्वा रोचने दिवः । इन्द्रँविश्वाऽअवीवृधन्त्समुद्रव्यचसङ्गिरः । रथीतमँ रथीनाँवाजानाँ सत्पतिम्पतिम् ॥

यन्त्री। राट्। यन्त्री। असि। यमनी। ध्रुवा। असि। धरित्री। इषे। त्वा। ऊर्ज्जे। त्वा। रय्यै। त्वा। पोषाय। त्वा॥२२॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे राज्य शक्ते ! तू ( मन्त्री ) समस्त राष्ट्र को नियम में रखने वाली ( राष्ट्र ) राजवैभव से प्रकाशमान होने से, तू ( यन्त्री असि ) यन्त्री, नियमकारिणी शक्ति कहाती है। तू ( यमनी ) नियम व्यवस्था करने वाली औ ( धरित्री ) प्रजा को धारण करने वाली पृथ्वी के समान ( ध्रुवा असि ) ध्रुव, स्थिर है । ( त्वा) तुझ राजशक्ति को पृथ्वी के समान जान कर मैं ( इषे ) अन्न सम्पदा की वृद्धि के लिये ( ऊर्जे ) पराक्रम के लिये, ( रय्यै ) प्राणशक्ति या ऐश्वर्य की वृद्धि के लिये और ( पोषाय ) पशु आदि समृद्धि के लिये या शरीरों की पुष्टि के लिये स्वीकार करता हूं ॥ शत० ८ । ३ । ४ । १० ॥
Subject
नियामक राजशक्ति का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
विश्वेदेवा ऋषयः । विदुषी देवता । निचृदुष्णिक् । ऋषभः ॥