Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 14 / Mantra 11

31 Mantra
14/11
Devata- इन्द्राग्नी देवते Rishi- विश्वेदेवा ऋषयः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑ग्नी॒ऽ अव्य॑थमाना॒मिष्ट॑कां दृꣳहतं यु॒वम्। पृ॒ष्ठेन॒ द्यावा॑पृथि॒वीऽ अ॒न्तरि॑क्षं च॒ विबा॑धसे॥११॥

इन्द्रा॑ग्नी॒ इतीन्द्रा॑ग्नी। अव्य॑थमानाम्। इष्ट॑काम्। दृ॒ꣳह॒त॒म्। यु॒वम्। पृ॒ष्ठेन॑। द्यावा॑पृथि॒वी इति॒ द्यावा॑ऽपृथि॒वी। अ॒न्तरि॑क्षम्। च॒। वि। बा॒ध॒से॒ ॥११ ॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नीऽअव्यथमानामिष्टकान्दृँहतँयुवम् । पृष्ठेन द्यावापृथिवी अन्तरिक्षञ्च विबाधसे ॥

इन्द्राग्नी इतीन्द्राग्नी। अव्यथमानाम्। इष्टकाम्। दृꣳहतम्। युवम्। पृष्ठेन। द्यावापृथिवी इति द्यावाऽपृथिवी। अन्तरिक्षम्। च। वि। बाधसे॥११॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे ( इन्द्राग्नी ) इन्द्र और अग्नि सेनापति और राजा या राजा और पुरोहित ! ( युवम् ) तुम दोनों ( अव्यथमानाम् ) पीड़ा को प्राप्त न होती हुई ( इष्टकाम् ) ऐश्वर्यों को प्रदान करने वाली प्रजा को ( दृंहतम् ) दृढ़ करो। हे प्रजे ! तू ( पृष्ठेन ) अपनी पृष्ट से ( द्यावापृथिवी ) द्यौ, पृथिवी और ( अन्तरिक्षं च ) अन्तरिक्ष तीनों लोकों को, ( विबाधसे ) प्राप्त होती है । सब स्थानों के भोग्य पदार्थों को प्राप्त होती है॥ शत० ८ । ३ । १ । ८ ॥
अथवा – हे इन्द्र और अग्नि के समान तेजस्वी स्त्री पुरुषो ! तुम दोनों अपीड़ित, इष्ट बुद्धि को प्राप्त होकर गृहस्थाश्रम को दृढ़ करो। वह गृहस्थाश्रम आकाश, पृथिवी, और अन्तरिक्ष माता पिता और पति तीनों की सेवा करती है।
Subject
राजा सेनापति या पुरोहित का कर्तव्य प्रजापालन।
Footenote
१ बाधृ विलोडने भ्वादि: । अथ तृतीया चितिः ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
विश्वकर्मा ऋषि । इन्द्राग्नी देवता भुरिगनुष्टुप् । गांधारः ॥