Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 16

57 Mantra
13/16
Devata- अग्निर्देवता Rishi- त्रिशिरा ऋषिः Chhand- स्वराडार्ष्यनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ध्रु॒वासि॑ ध॒रुणास्तृ॑ता वि॒श्वक॑र्मणा। मा त्वा॑ समु॒द्रऽ उद्व॑धी॒न्मा सु॑प॒र्णोऽअव्य॑थमाना पृथि॒वीं दृ॑ꣳह॥१६॥

ध्रु॒वा। अ॒सि॒। ध॒रुणा॑। आस्तृ॒तेत्याऽस्तृ॑ता। वि॒श्वक॑र्म॒णेति॑ वि॒श्वऽक॑र्मणा। मा। त्वा॒। स॒मु॒द्रः। उत्। व॒धी॒त्। मा। सु॒प॒र्ण इति॑ सुऽप॒र्णः। अव्य॑थमाना। पृ॒थि॒वीम्। दृ॒ꣳह॒ ॥१६ ॥

Mantra without Swara
धु्रवासि धरुणास्तृता विश्वकर्मणा । मा त्वा समुद्र उद्बधीन्मा सुपर्णा व्यथमाना पृथिवीन्दृँह ॥

ध्रुवा। असि। धरुणा। आस्तृतेत्याऽस्तृता। विश्वकर्मणेति विश्वऽकर्मणा। मा। त्वा। समुद्रः। उत्। वधीत्। मा। सुपर्ण इति सुऽपर्णः। अव्यथमाना। पृथिवीम्। दृꣳह॥१६॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे पृथिवि ! हे राजशक्ते ! हे स्त्रि ! तू ( ध्रुवा असि ) ध्रुव, सदा निश्चल भाव से रहनेवाली ( असि ) हो । ( धरुणा ) तू समस्त लोकों का आश्रय है और तू (विश्वकर्मणा) समस्त उत्तम कर्मों को करने में समर्थ शिल्पियों या प्रजापति, राजा द्वारा ( आस्तृता ) नाना उत्तम उपयोगी पदार्थों से आच्छादित एवं सुरक्षित रह । ( समुद्रः ) समुद्र या अकाश (त्वा) तुझको ( मा उद्धधीत् ) विनाश न करे । ( सुपर्णः ) उत्तम पालन करने वाले राज्यसाधनों से युक्त राजा भी ( त्वा मा उद्वधीत् ) तुझे न मारे । तू ( अव्यथमाना ) स्वयं पीड़ित न होकर ( पृथिवीं ) पृथिवी को या पृथिवी निवासिनी विशाल प्रजा को ( दृंह ) बढ़ा ।
यज्ञ में इस मन्त्र से आ'तृण्णा' का स्थापन करते हैं । 'आतृण्णा' पद से ब्राह्मणकार ने पृथिवी, अन्न, प्राण प्रतिष्ठा, स्त्री और पृथ्वीनिवासी लोकों को ग्रहण किया है। अन्नं वै स्वयम् आतृण्णा प्राणो वै स्वय- मातृरणा इयं ( पृथिवी ) स्वयमातृण्णा । या सा प्रतिष्ठा एषा सा प्रथमा स्वयमातृण्णा । इमे वै लोकाः स्वयमातृण्णा । इमे वै लोका: प्रतिष्ठा ॥ शत० ७।४।२।१।१० ॥
स्त्री पक्ष में -- हे स्त्रि ! तू ध्रुव हो, तू सब गृहस्थ सुखों का ( धरुणा ) आश्रय है । तू ( विश्वकर्मणा अस्तृता ) समस्त धर्म कार्यों के करने वाले पति द्वारा सुरक्षित हो ( समुद्रःत्वा मा उदवधीत् ) समुद्र के समान उमड़ने वाला कामोन्माद तुझे नाश न करे ( सुपर्णः) उत्तम पालक साधनों से सम्पन्न पति भी तुझे न मारे । तू ( अव्यथमाना ) निर्भय,पीड़ा, कष्ट से रहित रहकर ( पृथिवीं) पृथिवी के समान अपने शरीर मेंविद्यमान पुत्र प्रजननाङ्ग रूप भूमि को ( दृंह ) वृद्धि कर उनको हृष्ट पुष्ट कर ॥ शत० ७।४।२।५॥
समुद्र इव हि कामः । नहि कामस्यान्तोऽस्ति न समुद्रस्य । तै० २।२।५।६॥
पृथिवी पक्ष में- वह ध्रुव, स्थिर सर्वाश्रय है । बड़े शिल्पी उसको बड़े २ महल, सेतु उद्यान आदि आश्चर्यजनक पदार्थों और रक्षा साधन यदि द्वारा सुरक्षित रखें । समुद्र, अन्तरिक्ष और ( सुपर्णा: ) सूर्य और वायु ये पृथ्वी की शक्तियों का नाश न करें। प्रत्युत वह अपनी निवासी प्रजा की ही वृद्धि करे ।
Subject
पृथ्वी राजशक्ति, और पक्षान्तर में स्त्री का सुरक्षित रहने का वर्णन ।
Footenote
ऊर्ध्ववहती सर्वा० ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
आतृण्णा अग्निर्वा देवता । स्वराडार्ष्यनुष्टुप् । गान्धारः ।