Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 79

117 Mantra
12/79
Devata- वैद्यो देवता Rishi- भिषगृषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒श्व॒त्थे वो॑ नि॒षद॑नं प॒र्णे वो॑ वस॒तिष्कृ॒ता। गो॒भाज॒ऽइत् किला॑सथ॒ यत् स॒नव॑थ॒ पूरु॑षम्॥७९॥

अ॒श्व॒त्थे। वः॒। नि॒षद॑नम्। नि॒सद॑न॒मिति॑ नि॒ऽसद॑नम्। प॒र्णे। वः॒। व॒स॒तिः। कृ॒ता। गो॒भाज॒ इति॑ गो॒ऽभाजः॑। इत्। किल॑। अ॒स॒थ॒। यत्। स॒नव॑थ। पूरु॑षम्। पुरु॑ष॒मिति॒ पुरु॑षम् ॥७९ ॥

Mantra without Swara
अश्वत्थे वो निषदनम्पर्णे वो वसतिष्कृता । गोभाजऽइत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम् ॥

अश्वत्थे। वः। निषदनम्। निसदनमिति निऽसदनम्। पर्णे। वः। वसतिः। कृता। गोभाज इति गोऽभाजः। इत्। किल। असथ। यत्। सनवथ। पूरुषम्। पुरुषमिति पुरुषम्॥७९॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे प्रजाओ ! ( वः ) तुम्हारा (निषदनम् ) आश्रय ( अश्वत्थे ) अश्वारोही सेना बल पर है । ( वः वसतिः ) तुम्हारा निवास (पर्णे कृता ) पालन करनेवाले राजा के आधार पर किया है। (यत्) जब भी ( पुरुषम् ) पौरुष से युक्त राजा की सेवा करो, तो तुम भी ( गोभाजः ) गवादि पशु और भूमि आदि सम्पत्ति को प्राप्त करनेवाली (असथ किल ) अवश्य होजाओ ।
अथवा - हे मनुष्यो ! ( वः निषदनम् ) तुम जीव लोगों की जीवन स्थिति ( अश्वत्थे = अश्वः - स्थे) कल तक भी स्थिर न रहनेवाले देह पर और ( वः वसतिः ) तुम लोगों का वास ( पर्णो ) चञ्चल पत्र के समान इस चञ्चल प्राण पर किया है। आप लोग ( गोभाजः किल असथः ) पृथ्वी का आश्रय लेनेवाले रहो । और ( पुरुषं सनवथ ) पूर्ण पुरुष देह को प्राप्त करो ।
ओषधि पक्ष में- हे वीर्यवती ओषधियो! (यत्) जब (अश्वत्थे) पीपल के वृक्ष पर तुम्हारी स्थिति है, और पत्तों पर तुम निवास करती हो ।(गोभाजः इत् ) इन्द्रियों तक पहुंचती हो तो तुम ( पुरुषं सनवथ ) पुरुष सन्तान प्राप्त कराती हो ।