Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 45

117 Mantra
12/45
Devata- पितरो देवताः Rishi- सोमाहुतिर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अपे॑त॒ वीत॒ वि च॑ सर्प॒तातो॒ येऽत्र॒ स्थ पु॑रा॒णा ये च॒ नूत॑नाः। अदा॑द्य॒मोऽव॒सानं॑ पृथि॒व्याऽअक्र॑न्नि॒मं पि॒तरो॑ लो॒कम॑स्मै॥४५॥

अप॑। इ॒त॒। वि। इ॒त॒। वि। च॒। स॒र्प॒त॒। अतः॑। ये। अत्र॑। स्थ। पु॒रा॒णाः। ये। च॒। नूत॑नाः। अदा॑त्। य॒मः। अ॒व॒सान॒मित्य॑व॒ऽसान॑म्। पृ॒थि॒व्याः। अक्र॑न्। इ॒मम्। पि॒तरः॑। लो॒कम्। अ॒स्मै॒ ॥४५ ॥

Mantra without Swara
अपेत वीत वि च सर्पतातो ये त्र स्थ पुराणा ये च नूतनाः । अदाद्यमो वसानम्पृथिव्या अक्रन्निमम्पितरो लोकमस्मै ॥

अप। इत। वि। इत। वि। च। सर्पत। अतः। ये। अत्र। स्थ। पुराणाः। ये। च। नूतनाः। अदात्। यमः। अवसानमित्यवऽसानम्। पृथिव्याः। अक्रन्। इमम्। पितरः। लोकम्। अस्मै॥४५॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
हे ( पितरः ) राष्ट्र के पालक पुरुषो ! आप लोगों में से (अत्र ) इस राज्यपालन के कार्य में ( ये पुराणा: ) जो पुराने, पहले से नियुक्त और ( ये च ) जो ( नूतनाः ) नये नियुक्त हैं । वे ( अप इत ) दूर २ देशों में भी जायें. ( वि इत) विविध देशों में भ्रमण करें, (वि सर्पत ) विविध उपायों से सर्वत्र सर्पण कर गुप्त दूतों का भी काम करें। ( यमः ) सर्वनियन्ता राजा ( पृथिव्या ) पृथिवी में ( अवसानम् ) तुम लोगों को अधिकार और स्थान ( अदात् ) प्रदान करता है । और ( पितरः ) राज्य के पालक लोग (अस्मै ) इस राजा के लिये ( इमं लोकम् ) इस भूलोक को ( अक्रन् ) वश करते हैं।

शिक्षा-पक्ष में- ( ये पुराणा ये च नूतना: ) जो पुराने वृद्ध और नये ( पितरः ) पिता लोग हैं वे ( अपेत ) अधर्म से परे रहें । ( वि इत ) धर्म का पालन करें ( अत्र वि सर्पत च ) यहां ही विचरण करें। ( यमः ) नियामक आचार्य ( पृथिव्या अवसानं अदात् ) पृथिवी में तुमको अधिकार पद दे, आप लोग इसके लिये इस सत्य संकल्पवान् पुरुष के लिये ( इम लोकम् चक्रन् ) इस आत्मा का ज्ञान लाभ करावें ॥ शत० ७ । १। १ । २-४ ॥
Subject
चरों और प्रणिधियों का नियोजन पक्षान्तर में विद्वानों को संदेश।
Footenote
अथ गार्हपत्य चयनम् ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
लिंगोक्ताः पितरो देवता: । निचृदार्षी त्रिष्टुप् । धैवतः ॥