Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 38

117 Mantra
12/38
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- निचृदार्ष्यनुस्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्र॒सद्य॒ भस्म॑ना॒ योनि॑म॒पश्च॑ पृथि॒वीम॑ग्ने। स॒ꣳसृज्य॑ मा॒तृभि॒ष्ट्वं ज्योति॑ष्मा॒न् पुन॒रास॑दः॥३८॥

प्र॒सद्येति॑ प्र॒ऽसद्य॑। भस्म॑ना। योनि॑म्। अ॒पः। च॒। पृ॒थि॒वीम्। अ॒ग्ने॒। सं॒ऽसृज्येति॑ स॒म्ऽसृज्य॑। मा॒तृभि॒रिति॑ मा॒तृऽभिः॑। त्वम्। ज्योति॑ष्मान्। पुनः॑। आ। अ॒स॒दः॒ ॥३८ ॥

Mantra without Swara
प्रसद्य भस्मना योनिमपश्च पृथिवीमग्ने । सँसृज्य मातृभिष्ट्वञ्ज्योतिष्मान्पुनरासदः ॥

प्रसद्येति प्रऽसद्य। भस्मना। योनिम्। अपः। च। पृथिवीम्। अग्ने। संऽसृज्येति सम्ऽसृज्य। मातृभिरिति मातृऽभिः। त्वम्। ज्योतिष्मान्। पुनः। आ। असदः॥३८॥

Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Yajurveda Sanhita Bhasha Bhashya (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
जीवपक्ष में- हे (अग्ने) जीव ! तू ( भस्मना ) अपने देह की भस्म से ( पृथिवीम् प्रसद्य ) पृथिवी में मिलकर और ( भस्मना ) तेजमय वीर्यरूप से ही ( अपः ) जलों और ( योनिं च ) मातृयोनि को भी प्राप्त होकर ( मातृभिः ) माताओं के साथ पितृरूपों में ( संसृज्य ) संयुक्त होकर ( ज्योतिष्मान् )तेजस्वी बालक होकर ( पुनः आसदः ) पुनः इस लोक में आता है।अग्नि-पक्ष में अग्नि जिस प्रकार भस्म होकर पुनः पृथिवी पर लीन होजाता है और जलों से मिलकर फिर ( मातृभिः ) ईश्वर की निर्माणकारिणी शक्तियों से युक्त होकर वृत्तादि रूप में पुनः काष्ठ होकर उत्पन्न होता है और जलता है | शत० ६ । ८ । २ । ६ ॥
राजा के पक्ष में --हे (अग्ने) तेजस्विन् राजन् ! ( भस्मना ) अपने तेज से (योनिम् ) अपने मूलकारण उत्पादक और आश्रयरूप ( अपः ) प्रजाओं और ( पृथिवीम् ) पृथिवी को ( प्रसद्य ) प्राप्त होकर ( मातृभिः ) ज्ञानशील पुरुषों के साथ ( संसृज्य ) मिलकर ( ज्योतिष्मान् ) सूर्य के समान तेजस्वी होकर (पुनः) बार २ ( आ सदः ) अपने व्यसन पर आदर- पूर्वक विराज ।
Subject
जीवात्मा और राजा का वर्णन ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
अग्निर्देवता । निचृदार्ष्यनुष्टुप् । धैवतः ॥